Nuclear Relief Medicine: न्यूक्लियर इमरजेंसी के खौफ में खाड़ी देश, चंडीगढ़ की दवा कंपनी से 1 करोड़ कैप्सूल की क्षमता पूछी... जानें कौन सी है परमाणु अटैक से राहत वाली दवा?

Edited By Updated: 12 Mar, 2026 12:02 PM

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खाड़ी के देशों ने अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु हमले के खतरे के बीच सुरक्षा इंतजाम तलाशना भी शुरू कर दिया है. बहरीन की एक दवा कंपनी ने भारत की तरफ भी उम्मीद से देखा है. परमाणु संबंधी इमर्जेंसी कंडीशन में काम आने वाले दवाओं के बारे में तफ्तीश की गई है....

Nuclear Attack Medicine:  ईरान और अमेरिका के बीच गहराते तनाव ने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। युद्ध का मैदान भले ही सरहदों पर हो, लेकिन इसकी सबसे भयानक परछाईं उन खाड़ी देशों पर पड़ रही है जो परमाणु हमले के खौफ में जी रहे हैं। इस अदृश्य खतरे (रेडिएशन) से निपटने के लिए अब दुनिया की नजरें भारत की मेडिकल ताकत पर टिकी हैं।  बहरीन की एक दवा कंपनी ने परमाणु संबंधी इमर्जेंसी कंडीशन में काम आने वाले दवाओं के बारे में तफ्तीश करनी बी शुरू कर दी है। इस दवा का नाम है- प्रशियन ब्लू कैप्सूल और पोटेशियम आयोडाइड, आइए जानते है इसके बारे में...

दरअसल, बहरीन की एक बड़ी दवा कंपनी 'लायजनिक एजेंट' ने भारत से संपर्क साधकर उन विशेष दवाओं की मांग की है, जो परमाणु तबाही के बाद इंसानी शरीर के लिए सुरक्षा कवच का काम करती हैं। बहरीन की फार्मास्युटिकल संपर्क कंपनी ने चंडीगढ़ स्थित एक दवा निर्माता कंपनी से इन कैप्सूल के उत्पादन के बारे में पूछताछ की है। चंडीगढ़ स्थित कंपनी से पूछा गया है कि क्या उसके पास लगभग 10 मिलियन कैप्सूल बनाने की क्षमता है और विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के लिए कितनी खुराक की आवश्यकता होगी।

प्रशियन ब्लू: शरीर से जहर निकालने वाला 'ब्लू मैजिक'
बहरीन ने भारत से करीब एक करोड़ 'प्रशियन ब्लू' कैप्सूल  (Prussian Blue Capsule) की क्षमता के बारे में पूछताछ की है। यह कोई साधारण दवा नहीं है, बल्कि डीआरडीओ (DRDO) की तकनीक से विकसित एक ऐसा फॉर्मूला है जो रेडियोधर्मी कचरे को शरीर से बाहर खदेड़ देता है।

कैसे काम करती है ये दवा:
जब कोई व्यक्ति परमाणु विकिरण की चपेट में आता है, तो उसके शरीर में सीजियम-137 और थैलियम जैसे घातक तत्व जमा हो जाते हैं। 'प्रशियन ब्लू'  (Prussian Blue Capsule) जिसे रेडियोगार्डेस भी कहते हैं... आंतों में जाकर इन जहरीले तत्वों को जकड़ लेता है और उन्हें रक्त में घुलने से पहले ही मल के जरिए शरीर से बाहर निकाल देता है। यह दवा एफडीए से मान्यता प्राप्त है और हाल ही में भारत ने इसकी खेप इंडोनेशिया भी भेजी थी।

पोटेशियम आयोडाइड: थायराइड का रक्षक
परमाणु आपातकाल के लिए दूसरी सबसे जरूरी चीज है 'पोटेशियम आयोडाइड' Potassium iodide (KI)। बहरीन ने इसकी भी सवा करोड़ गोलियों की उपलब्धता जांची है। हवा में फैले रेडियोएक्टिव आयोडीन का सबसे बुरा असर गले की थायराइड ग्रंथि पर पड़ता है, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। पोटेशियम आयोडाइड की खुराक थायराइड को 'फुल' कर देती है, जिससे वह जहरीले आयोडीन को सोख नहीं पाता। यह एक तरह से शरीर के संवेदनशील अंगों पर ताला लगाने जैसा काम करता है ताकि रेडिएशन अंदर न घुस सके।

भारत बनेगा खाड़ी देशों का 'संजीवनी केंद्र'?
अगर यह डील फाइनल होती है, तो भारत से ये दवाएं बहरीन के रास्ते कतर, कुवैत और जॉर्डन तक पहुंचेंगी। पिछले साल भी जब ईरान-इजरायल विवाद बढ़ा था, तब इन दवाओं की चर्चा हुई थी, लेकिन मामला शांत होने पर बात रुक गई थी। अब परमाणु युद्ध की आहट ने खाड़ी देशों को फिर से दवाओं का स्टॉक जमा करने पर मजबूर कर दिया है।

सावधानी की बात: ये दोनों दवाएं केवल परमाणु हमले या गंभीर रेडिएशन की स्थिति में ही काम आती हैं। इन्हें बिना डॉक्टरी सलाह के लेना बेहद खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इनका गलत इस्तेमाल शरीर के सिस्टम को बिगाड़ सकता है। फिलहाल, भारत की ये 'मेडिकल ढाल' वैश्विक शांति और सुरक्षा के नजरिए से बेहद अहम मानी जा रही है। 

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