गणित में क्यों पीछे रह जाती हैं लड़कियां? जेंडर गैप का चौंकाने वाला खुलासा, ब्रिटेन की स्टडी ने खोली परतें

Edited By Updated: 11 Jan, 2026 07:43 PM

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ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की चैरिटी के सर्वे में खुलासा हुआ है कि माताओं की गणित को लेकर चिंता बेटियों में भी ट्रांसफर हो जाती है। इससे लड़कियों का आत्मविश्वास घटता है और उम्र के साथ मैथ्स में जेंडर गैप गहराता जाता है।

London: ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति द्वारा स्थापित शिक्षा चैरिटी ‘द रिचमंड प्रोजेक्ट’ के एक नए सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, माताओं की गणित को लेकर घबराहट और आत्मविश्वास की कमी अनजाने में उनकी बेटियों तक पहुंच रही है, जिससे समय के साथ मैथ्स में लड़के-लड़कियों के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है। रविवार को ‘द संडे टाइम्स’ में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, चार से आठ साल की उम्र में ही यह फर्क दिखाई देने लगता है। जहां 51 प्रतिशत लड़के गणित को “आसान” मानते हैं, वहीं केवल 41 प्रतिशत लड़कियां ऐसा सोचती हैं। यह अंतर उम्र के साथ और गहरा हो जाता है। 9 से 18 वर्ष की उम्र में 86 प्रतिशत लड़के मैथ्स में आत्मविश्वास महसूस करते हैं, जबकि लड़कियों का आंकड़ा सिर्फ 63 प्रतिशत रह जाता है।

 

अक्षता मूर्ति ने बताया कि महिलाएं अक्सर बच्चों के गणित के होमवर्क में मदद करते समय ज्यादा घबराहट महसूस करती हैं। उन्होंने कहा, “अगर एक बच्ची अपनी मां को मैथ्स से डरते हुए देखती है, तो वह अवचेतन रूप से वही डर अपना लेती है। यही चिंता पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है।” अक्षता मूर्ति ने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी मां सुधा मूर्ति इंजीनियर रही हैं और परिवार में STEM से जुड़े कई रोल मॉडल रहे, जिससे गणित को लेकर उनका नजरिया सकारात्मक बना।

 

‘द रिचमंड प्रोजेक्ट’ का उद्देश्य रोजमर्रा की जिंदगी में गणित के उपयोग को सरल और व्यावहारिक बनाना है  जैसे बजट बनाना, खरीदारी की योजना, खाना पकाने की मात्रा तय करना या यात्रा का समय समझना। इस अध्ययन में 8,000 वयस्कों को शामिल किया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग दोगुना अधिक संख्या में अंकों को लेकर घबराहट महसूस करती हैं। कार्यस्थल पर सिर्फ 43 प्रतिशत महिलाएं नंबरों के साथ काम करना पसंद करती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 61 प्रतिशत है। अक्षता मूर्ति का मानना है कि मैथ्स को किसी “डरावने और अमूर्त विषय” की जगह समस्या-समाधान का कौशल बनाकर पेश करना जरूरी है। यही वजह है कि वे अपनी बेटियों के साथ पहेलियां, क्रॉसवर्ड और नंबर गेम्स खेलती हैं।

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