Aniruddhacharya Maharaj: एक दिन की कथा के लिए कितनी लेते है फीस? जानें कुल कमाई और नेटवर्थ

Edited By Updated: 12 Feb, 2026 02:31 PM

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आज के दौर में अगर कोई आध्यात्मिक गुरु सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्क्रीन्स तक छाया हुआ है, तो वह हैं अनिरुद्धाचार्य महाराज। अपने अनूठे अंदाज और बेबाक सवालों-जवाबों के कारण इंटरनेट पर 'पूकी महाराज' के नाम से मशहूर हो चुके अनिरुद्ध महाराज की लोकप्रियता...

नेशनल डेस्क: आज के दौर में अगर कोई आध्यात्मिक गुरु सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्क्रीन्स तक छाया हुआ है, तो वह हैं अनिरुद्धाचार्य महाराज। अपने अनूठे अंदाज और बेबाक सवालों-जवाबों के कारण इंटरनेट पर 'पूकी महाराज' के नाम से मशहूर हो चुके अनिरुद्ध महाराज की लोकप्रियता किसी सुपरस्टार से कम नहीं है। जैसे-जैसे उनके भक्तों और फॉलोअर्स की संख्या बढ़ रही है, लोगों के मन में यह सवाल भी कौंध रहा है कि आखिर उनकी एक कथा की फीस कितनी होती है और उनकी कुल संपत्ति कितनी है।

7 दिन की भागवत कथा का क्या है रेट? 
मीडिया में चल रही विभिन्न रिपोर्टों की मानें तो अनिरुद्धाचार्य महाराज की एक दिन की फीस करीब 1 से 3 लाख रुपये के बीच होती है। अगर कोई आयोजक उनसे पूरे 7 दिन की श्रीमद् भागवत कथा कराना चाहता है, तो इसके लिए उन्हें 10 लाख से 15 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। हालांकि, यह रकम कथा के आयोजन के स्तर और शहर की दूरी पर निर्भर करती है। फीस के अलावा, उनके और उनकी टीम के रहने, खाने और यात्रा का पूरा इंतजाम भी आयोजकों को ही करना होता है।

यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म से छप्परफाड़ कमाई 
महाराज जी सिर्फ कथा के पंडालों से ही नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया से भी मोटा मुनाफा कमाते हैं। उनके यूट्यूब चैनल पर करोड़ों की व्यूअरशिप है, जिससे विज्ञापनों के जरिए हर महीने करीब 2 लाख रुपये की आय होने का अनुमान है। अगर उनकी महीने की कुल कमाई को देखा जाए, तो कथा, यूट्यूब और ब्रांड प्रमोशन मिलाकर यह आंकड़ा 45 लाख रुपये के आसपास पहुंच जाता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2025 तक उनकी कुल अनुमानित नेटवर्थ लगभग 25 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

कमाई का बड़ा हिस्सा जाता है समाज सेवा में 
भले ही उनके पास करोड़ों की दौलत हो, लेकिन उनके जीवन का एक बड़ा पहलू चैरिटी से जुड़ा है। वृंदावन में स्थित उनका 'गौरी गोपाल आश्रम' हजारों लोगों के लिए आस्था और सेवा का केंद्र है। बताया जाता है कि उनकी कमाई का अधिकांश हिस्सा गौ सेवा, गरीबों के लिए चलने वाले भंडारों, जरूरतमंदों के इलाज और अन्य सामाजिक कार्यों में लगा दिया जाता है। उनकी यही परोपकारी छवि उन्हें सिर्फ एक कथावाचक ही नहीं, बल्कि एक जनसेवक के रूप में भी स्थापित करती है।

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