बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं रख सकते, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह मौलिक अधिकार है

Edited By Updated: 17 Oct, 2026 04:20 PM

children cannot be kept completely away from the internet the supreme court has

ऑनलाइन यौन शोषण, साइबर बुलिंग, अनुचित सामग्री और बच्चों को इंटरनेट के जरिए फंसाने जैसी समस्याएं के कारण सोशल मीडिया और इंटरनेट पर होने वाले खतरों से बचाने के लिए सख्त नियम बनाने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज का दिया है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने का अधिकार बच्चों समेत हर व्यक्ति को प्राप्त है। अदालत ने उम्र के आधार पर इंटरनेट के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। हालांकि, बच्चों को ऑनलाइन यौन शोषण और आपत्तिजनक सामग्री से बचाने के लिए सख्त सुरक्षा उपाय अपनाने पर जोर दिया। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी चंद्रन की पीठ ने 15 अक्टूबर को यह टिप्पणी की। अदालत बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ और एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से दायर आवेदनों पर सुनवाई कर रही थी। इन आवेदनों में आरोप लगाया गया था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की जानकारी भारतीय अधिकारियों को देने के अपने कानूनी दायित्वों का ठीक से पालन नहीं कर रहे हैं।

बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी, दोनों जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों को उनकी उम्र के आधार पर इंटरनेट के अधिकार से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता। बच्चों को भी वही अधिकार प्राप्त हैं, जो अन्य व्यक्तियों को मिलते हैं। अदालत ने कहा, “बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। बच्चों को दोनों का अधिकार है।” पीठ ने यह भी कहा कि कानून के जरिए बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर रोक लगा देने से वे इंटरनेट का उपयोग करना बंद नहीं कर देंगे। इसलिए पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय उनकी ऑनलाइन सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सख्त निगरानी और पैरेंटल कंट्रोल पर जोर
अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए सख्त अभिभावकीय नियंत्रण (पैरेंटल कंट्रोल), बच्चों के लिए विशेष सुरक्षित मोड और यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को हटाने जैसे उपायों पर जोर दिया। पीठ ने अधिकारियों और सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि पीड़ितों की सुरक्षा के लिए गंभीर प्रयासों की कमी दिखाई देती है। स्पष्ट दिशा-निर्देश होने के बावजूद बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री बार-बार सामने आ रही है। अदालत ने सोशल मीडिया पर ऐसे आपत्तिजनक कंटेंट के प्रचार और लिंक के जरिए दूसरी वेबसाइटों तक पहुंचाए जाने से जुड़ी खबरों पर भी चिंता जताई।

केंद्र सरकार को राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश
याचिकाकर्ताओं ने ऐसी सामग्री की रिपोर्ट करने के लिए एक समान प्रक्रिया, केंद्रीय पोर्टल और नियमों का पालन नहीं करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी प्रमाणित सामग्री की पहचान के लिए डिजिटल पहचान संकेतकों और वेबसाइट लिंक (URL) का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया। अदालत ने केंद्र सरकार से ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के लिए दिशा-निर्देश तथा मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOP) तैयार करने को भी कहा। इसमें डिजिटल सामग्री की पहचान के लिए हैश-मैचिंग तकनीक और URL की सूची तैयार करने जैसे उपाय शामिल होंगे।

बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के लिए इंटरनेट पर कोई जगह नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट पर बिना सहमति के तैयार या प्रसारित की गई यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। खासकर उन प्लेटफॉर्म पर, जिनका इस्तेमाल बच्चे आसानी से कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट के लाभों से वंचित किए बिना उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों और संबंधित अधिकारियों को मिलकर प्रभावी कदम उठाने होंगे।

 

 

 

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