236 करोड़ के बैंक फ्रॉड केस में ED का बड़ा एक्शन, पूर्व MD संदीप गुप्ता गिरफ्तार

Edited By Updated: 22 Jan, 2026 07:28 PM

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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक बड़े बैंक घोटाले में सख्त कार्रवाई करते हुए रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड के पूर्व प्रमोटर और निलंबित मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप गुप्ता को गिरफ्तार किया है।

नेशनल डेस्क: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक बड़े बैंक घोटाले में सख्त कार्रवाई करते हुए रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड के पूर्व प्रमोटर और निलंबित मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप गुप्ता को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई गुरुग्राम जोनल ऑफिस के जरिए की गई। आरोपी को 20 जनवरी 2026 को PMLA के तहत हिरासत में लिया गया। ED ने संदीप गुप्ता को गुरुग्राम की विशेष अदालत में पेश किया, जहां कोर्ट ने उन्हें 8 दिन की ED रिमांड पर भेज दिया।

CBI की FIR से शुरू हुई जांच

यह मामला CBI द्वारा दर्ज FIR पर आधारित है। आरोप है कि वर्ष 2015 से 2018 के बीच आरोपी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ धोखाधड़ी कर करीब 236 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया। जांच एजेंसियों के अनुसार, कंपनी ने फर्जी दस्तावेजों और गलत लेन-देन दिखाकर बैंकों से लोन लिया और बाद में उन फंड्स का दुरुपयोग किया।

फर्जी बिक्री और शेल कंपनियों का जाल

ED की जांच में सामने आया है कि कंपनी ने बिना किसी वास्तविक सप्लाई के कॉटन फैब्रिक और सोलर प्रोजेक्ट्स से जुड़ी करोड़ों रुपये की फर्जी बिक्री दिखाई। इसके लिए कई शेल कंपनियों के जरिए लेन-देन दिखाया गया ताकि बैंक यह मानें कि कारोबार बढ़ रहा है। आरोप है कि बिल, लेजर और अकाउंट्स में हेरफेर कर टर्नओवर को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया गया।

मशीन खरीद से लेकर लोन ट्रांसफर तक गड़बड़ी

जांच में यह भी पाया गया कि कंपनी ने ZLD मशीनों की करोड़ों रुपये की खरीद दिखाई, जबकि संबंधित सप्लायर कंपनी का इस तरह के कारोबार से कोई लेना-देना नहीं था। इसके अलावा, 2015 से 2018 के बीच कंपनी के फंड्स को अलग-अलग ग्रुप कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिसे लोन चुकाने के रूप में दिखाया गया।

इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया में भी कथित खेल

कंपनी की कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) दिसंबर 2018 में शुरू हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका। अंततः 11 जून 2025 को NCLT ने कंपनी को लिक्विडेशन में डाल दिया। अक्टूबर 2025 में कंपनी की संपत्तियां केवल 96 करोड़ रुपये में नीलाम हुईं, जबकि बैंकों के कुल दावे करीब 696 करोड़ रुपये के थे। इसका मतलब बैंकों को लगभग 94 फीसदी का हेयरकट सहना पड़ा।

CIRP से पहले संपत्ति ट्रांसफर और वोटिंग पावर का खेल

ED का आरोप है कि संदीप गुप्ता ने दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले कीमती संपत्तियों का ट्रांसफर कर दिया। साथ ही, कई कंपनियों को कॉरपोरेट गारंटी देकर कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में उनका प्रभाव बढ़ाया गया, जिससे बड़े फैसले अटक गए। जांच में यह भी सामने आया कि बेनामी शेल कंपनियां बनाकर पुराने कर्मचारियों को आगे किया गया और CIRP के दौरान भी परिवार ने परोक्ष रूप से नियंत्रण बनाए रखा।

ED के मुताबिक, यह मामला बैंक फ्रॉड, मनी लॉन्ड्रिंग और इनसॉल्वेंसी नियमों के उल्लंघन का एक संगठित उदाहरण है, जिसमें सिस्टम का दुरुपयोग कर बैंकों को भारी नुकसान पहुंचाया गया। मामले की जांच अभी जारी है और आगे और गिरफ्तारियां या संपत्ति जब्ती की कार्रवाई हो सकती है।

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