Edited By Rohini Oberoi,Updated: 22 May, 2026 02:44 PM

भारत में आधुनिक माता-पिता (Parents) द्वारा अपने बच्चों को बड़ा करने और उनकी परवरिश करने के पारंपरिक तरीकों में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। 'यूगोव-मिंट-सीपीआर मिलेनियल सर्वे' (YouGov-Mint-CPR Millennial Survey) की ताजा...
Indian Parenting Trends Survey : भारत में आधुनिक माता-पिता (Parents) द्वारा अपने बच्चों को बड़ा करने और उनकी परवरिश करने के पारंपरिक तरीकों में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। 'यूगोव-मिंट-सीपीआर मिलेनियल सर्वे' (YouGov-Mint-CPR Millennial Survey) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार आज की पीढ़ी के माता-पिता अपने बच्चों को उस सख्ती और दबाव के माहौल में बड़ा नहीं करना चाहते जैसा उन्होंने खुद अपने बचपन में अनुभव किया था। सर्वेक्षण में शामिल हर पांच में से सिर्फ एक व्यक्ति (लगभग 20%) ने यह माना कि वह अपने बच्चों की परवरिश ठीक उसी पुराने ढर्रे पर करना चाहता है जैसे उसके माता-पिता ने की थी। बाकी सभी लोग आधुनिक और खुले विचारों वाले तरीकों को अपना रहे हैं।
एक्स्ट्रा एक्टिविटीज को मिला बढ़ावा
बदलते दौर में अब माता-पिता बच्चों के केवल रिपोर्ट कार्ड (मार्क्स) को ही सफलता का पैमाना नहीं मान रहे हैं। पहले जहां 54 फीसदी माता-पिता का पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ बच्चों की पढ़ाई पर केंद्रित रहता था वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 43 फीसदी रह गया है।

आज के माता-पिता बच्चों को खेलकूद, संगीत, कला (Arts) और अन्य रचनात्मक गतिविधियों (Extra-curricular Activities) में आगे बढ़ने के लिए खुलकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे बच्चों को अपना करियर चुनने की पूरी आजादी देना चाहते हैं। बच्चों पर पारंपरिक और धार्मिक मूल्यों को थोपने का चलन भी 57 फीसदी से घटकर 49 फीसदी पर आ गया है।
देश में छा रहा है सौम्य पालन-पोषण
इस सर्वे की सबसे बड़ी बात यह है कि देश में सौम्य पालन-पोषण (Gentle Parenting) का चलन बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। देश के करीब 75 फीसदी लोग बच्चों पर चिल्लाने, हाथ उठाने या अत्यधिक सख्ती करने के बजाय प्यार, समझदारी और दोस्ताना रवैये (सौम्य तरीका) से उन्हें समझाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

दक्षिण भारत के माता-पिता सबसे ज्यादा उदार
भौगोलिक दृष्टि से भी भारत में परवरिश के तरीकों में बड़ा अंतर देखा गया है। दक्षिण भारतीय राज्यों में पेरेंटिंग का रवैया सबसे ज्यादा उदार, लचीला और आजादी देने वाला पाया गया है। वहां सिर्फ 39 फीसदी लोग ही पढ़ाई को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। देश के अन्य हिस्सों (उत्तर, पूर्व और पश्चिम) में आज भी 43 से 47 फीसदी माता-पिता पढ़ाई को ही जीवन में सबसे पहला और महत्वपूर्ण पायदान मानते हैं। सर्वे में यह भी सामने आया कि जो परिवार आर्थिक रूप से संपन्न और साधनयुक्त हैं वे आज भी बच्चों के लिए एक सुरक्षित, स्थिर और सरकारी या कॉर्पोरेट नौकरी को ही प्राथमिकता देते हैं और उनका झुकाव थोड़ा पारंपरिक तरीकों की तरफ ज्यादा है।
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डिजिटल युग की तीन सबसे बड़ी चिंताएं
आज के समय में तकनीक और शहरी माहौल ने माता-पिता के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। शहरों में रहने वाले माता-पिता की रातों की नींद उड़ाने वाले तीन सबसे बड़े कारण ये हैं:
स्मार्टफोन और डिजिटल लत (65%): सर्वे में शामिल सबसे ज्यादा 65 फीसदी माता-पिता ने माना कि बच्चों का मोबाइल, गेमिंग और इंटरनेट स्क्रीन से चौबीसों घंटे चिपके रहना उनकी सबसे बड़ी चिंता है।
सोशल मीडिया का गलत कंटेंट (57%): 57 फीसदी माता-पिता इस बात से डरते हैं कि इंटरनेट पर मौजूद अश्लील, हिंसक या भ्रामक कंटेंट उनके बच्चों के मानसिक विकास को नुकसान पहुँचा रहा है।
शारीरिक सुरक्षा और प्रदूषण (51%): 51 फीसदी लोग शहरों में बढ़ते प्रदूषण, खराब वातावरण और बच्चों की बाहरी (शारीरिक) सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं।