Edited By Anu Malhotra,Updated: 21 Oct, 2025 10:14 AM
हर साल दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का पावन पर्व मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति, पशु सेवा और परमात्मा की उपासना का अद्भुत संगम है। इस दिन लोग न केवल भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उठाए गए गोवर्धन पर्वत की...
नेशनल डेस्क: हर साल दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का पावन पर्व मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति, पशु सेवा और परमात्मा की उपासना का अद्भुत संगम है। इस दिन लोग न केवल भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उठाए गए गोवर्धन पर्वत की स्मृति में पर्वत स्वरूप बनाते हैं, बल्कि अन्नकूट के भोग के माध्यम से अन्न, गाय और प्रकृति की कृतज्ञता भी प्रकट करते हैं।
आइए इस वर्ष 2025 में गोवर्धन पूजा कब और कैसे करनी है, इसकी संपूर्ण जानकारी जानते हैं।
-गोवर्धन पूजा 2025 में कब मनाई जाएगी?
इस बार गोवर्धन पूजा बुधवार, 22 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी।
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि इस दिन सूर्योदय के समय विद्यमान रहेगी, इसलिए धार्मिक दृष्टिकोण से यही दिन गोवर्धन पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
-पूजन का शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Muhurat 2025)
प्रातःकाल पूजा मुहूर्त – सुबह 06:30 AM से 08:47 AM तक
सायंकाल पूजा मुहूर्त – शाम 03:36 PM से 05:52 PM तक
प्रतिपदा तिथि आरंभ – 21 अक्टूबर, शाम 05:54 PM
प्रतिपदा तिथि समाप्त – 22 अक्टूबर, रात 08:16 PM
-गोवर्धन पूजा में लगने वाली सामग्री
पूजा में जिन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, वे प्रकृति और गौसेवा से जुड़ी होती हैं। नीचे पूजा में आवश्यक सामग्री की सूची दी गई है:
गाय का गोबर (गोवर्धन पर्वत और आकृतियाँ बनाने हेतु)
मिट्टी का कलश, स्वच्छ जल और गंगाजल
मोरपंख, रंगीन वस्त्र (गाय और बछड़े सजाने हेतु)
शंख, घंटी, दीपक, धूप-बत्ती, आरती थाली
फूल (गेंदा, कमल या तुलसी)
रोली, हल्दी, अक्षत (चावल)
दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत के लिए)
पान, सुपारी, लौंग, इलायची
ताज़े फल, मिठाइयाँ और अन्नकूट भोग
घास और साफ जल (गौमाता के अभिषेक हेतु)
जौ के बीज (परिक्रमा के लिए)
-गोवर्धन पूजा की संपूर्ण विधि (Step-by-Step Govardhan Puja Vidhi)
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, शुद्ध वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को स्वच्छ करके सजाएं।
यदि घर में गाय या बछड़ा है तो उन्हें रंग-बिरंगे वस्त्रों, गेरू और मोरपंख से सजाएं।
शुभ मुहूर्त में आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत और मवेशियों की आकृतियाँ बनाएं।
पर्वत और आकृतियों को फूलों और अपमार्ग (चिरचिटा) से सजाएं।
गोवर्धन पर्वत की नाभि में मिट्टी का दीपक रखें और उसमें दूध, दही, शहद, बताशे, गंगाजल आदि डालें।
इस दीपक को पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप सभी में वितरित करें।
परिक्रमा करते समय हाथ में कलश लेकर उसमें से जल की धार गिराते जाएं और साथ ही जौ के बीज बिखेरते हुए सात बार परिक्रमा करें।
इस दिन श्रीकृष्ण की विशेष पूजा भी होती है – भगवान को दूध, दही, गंगाजल से स्नान कराएं, फिर पुष्प, कुमकुम, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
श्रीकृष्ण का षोडशोपचार पूजन करें और अंत में आरती कर के पूजा पूर्ण करें।
अन्नकूट: गोवर्धन पूजा का विशेष प्रसाद
इस दिन एक और खास परंपरा होती है – अन्नकूट भोग, जिसमें तरह-तरह के पकवान, सब्जियाँ, मिठाइयाँ और प्रसाद भगवान को अर्पित किए जाते हैं। यह अर्पण न केवल भगवान के लिए होता है, बल्कि 'अन्न ही ब्रह्म है' इस सिद्धांत को मानते हुए प्रकृति के आभार के रूप में भी किया जाता है।
गोवर्धन पूजा का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
श्रीकृष्ण ने इंद्र के घमंड को चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया था और ब्रजवासियों को संदेश दिया कि वर्षा और प्रकृति की पूजा करो, न कि घमंड में डूबे देवों की।
गोवर्धन पूजा इसी चेतना को जीवन में अपनाने का पर्व है—जहां प्रकृति, पशु, अन्न और भगवान के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है।