IDFC बैंक घोटाला: 590 करोड़ की हेराफेरी का 'इनसाइडर' खेल, कैसे एक पूर्व मैनेजर ने बिछाया फर्जीवाड़े का जाल?

Edited By Updated: 25 Feb, 2026 11:22 AM

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हरियाणा के बैंकिंग और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों 590 करोड़ रुपये के एक बड़े घोटाले ने हड़कंप मचा रखा है। चंडीगढ़ स्थित IDFC First Bank की शाखा से जुड़े इस गबन मामले में विजिलेंस विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मास्टरमाइंड सहित चार आरोपियों को...

नेशनल डेस्क:  हरियाणा के बैंकिंग और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों 590 करोड़ रुपये के एक बड़े घोटाले ने हड़कंप मचा रखा है। चंडीगढ़ स्थित IDFC First Bank की शाखा से जुड़े इस गबन मामले में विजिलेंस विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मास्टरमाइंड सहित चार आरोपियों को सलाखों के पीछे भेज दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे खेल का पर्दाफाश किसी बड़े ऑडिट से नहीं, बल्कि एक सरकारी विभाग द्वारा अपना खाता बंद करने की सामान्य सी अर्जी से हुआ। सरकार का दावा है कि उन्होंने मुस्तैदी दिखाते हुए पूरी रकम रिकवर कर ली है, लेकिन इस घोटाले की परतों ने बैंकिंग सुरक्षा और सरकारी धन के रख-रखाव पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

साजिश का सूत्रधार: कौन है मास्टरमाइंड रिभव ऋषि?
विजिलेंस की जांच में इस पूरे घोटाले का मुख्य चेहरा रिभव ऋषि बनकर उभरा है। रिभव की प्रोफाइल काफी चौंकाने वाली है; वह पहले IDFC First Bank में ही मैनेजर के पद पर तैनात था और वर्तमान में AU Small Finance Bank में कार्यरत था। बैंकिंग सिस्टम की बारीकियों से वाकिफ होने के कारण उसने फर्जी कंपनियों का एक जाल बुना और सरकारी धन को ठिकाने लगाने की साजिश रची। इस काम में उसने अभय कुमार, स्वाति सिंगला और अभिषेक सिंगला जैसे साथियों की मदद ली, जिन्हें 24 फरवरी की शाम गिरफ्तार किया गया।

खुलासे की कहानी: एक 'क्लोजर रिक्वेस्ट' ने बिगाड़ा खेल
इस घोटाले की शुरुआत फरवरी 2026 में हुई, जब हरियाणा सरकार ने IDFC First Bank और AU Small Finance Bank को सरकारी कामकाज की सूची से बाहर (De-empanel) कर दिया। इसके बाद सभी सरकारी विभागों को इन बैंकों से अपना पैसा निकालकर अधिकृत बैंकों में ट्रांसफर करने का आदेश दिया गया। जब एक विभाग ने अपना खाता बंद करने की प्रक्रिया शुरू की, तो बैंक स्टेटमेंट और वास्तविक बैलेंस के बीच जमीन-आसमान का अंतर मिला। शुरुआती जांच में यह गड़बड़ी 490 करोड़ की थी, जो गहन पड़ताल के बाद 590 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

मोडस ऑपेरंडी: न कोई हैकिंग, न हाई-टेक सेंधमारी
हैरानी की बात यह है कि यह कोई जटिल साइबर अपराध नहीं था। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह एक पारंपरिक 'इनसाइडर जॉब' थी। बैंक के कुछ कर्मचारियों ने बाहरी सिंडिकेट के साथ मिलकर सरकारी खातों से अनाधिकृत ट्रांजेक्शन किए और फर्जी चेक के जरिए पैसा निकाला। इस काली कमाई को छिपाने के लिए कई फर्जी (शेल) कंपनियां बनाई गईं, जिनमें यह पैसा ट्रांसफर किया गया ताकि जांच एजेंसियों को मनी ट्रेल का पता न चल सके।

सरकार बनाम विपक्ष: रिकवरी और जवाबदेही पर रार
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने विधानसभा में इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि प्रशासन ने समय रहते चूक को पकड़ लिया और जनता का एक-एक पैसा सुरक्षित वापस मंगा लिया गया है। हालांकि, विपक्ष इस दलील से संतुष्ट नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कांग्रेस नेता बीबी बत्रा ने इस मामले की CBI जांच की मांग की है। विपक्ष का तर्क है कि सिर्फ पैसा वापस आ जाना काफी नहीं है; यह पता लगाना जरूरी है कि यह पैसा गया कहां था और इस साजिश में किन बड़े अधिकारियों या सफेदपोशों का हाथ है।

बाजार और बैंकिंग सिस्टम पर प्रभाव
इस घोटाले की खबर का असर सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहा। शेयर बाजार में IDFC First Bank के शेयरों में करीब 20 प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गई, जिससे निवेशकों की लगभग 14,000 करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई। हालांकि, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसे एक स्थानीय मामला बताते हुए भरोसा दिलाया है कि इससे पूरे बैंकिंग ढांचे को कोई खतरा नहीं है, लेकिन रिजर्व बैंक इस पूरी स्थिति पर कड़ी नजर रखे हुए है।

आगे की राह और लंबित सवाल
वर्तमान में बैंक ने चार दोषी कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है और KPMG द्वारा फोरेंसिक ऑडिट कराया जा रहा है। विजिलेंस और एंटी-करप्शन ब्यूरो अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या इस नेटवर्क में कुछ आईएएस अधिकारी या अन्य सरकारी कर्मचारी भी शामिल थे। सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि जांच का दायरा बैंक की चारदीवारी से बाहर तक जाएगा और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

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