Edited By Pooja Gill,Updated: 30 Mar, 2026 12:19 PM

नेशनल डेस्क: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर अब भारत के बासमती चावल निर्यात पर साफ दिखने लगा है। बढ़ते माल भाड़े (फ्रेट रेट), कंटेनरों की कमी और सप्लाई चेन में रुकावटों के चलते व्यापारियों...
नेशनल डेस्क: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर अब भारत के बासमती चावल निर्यात पर साफ दिखने लगा है। बढ़ते माल भाड़े (फ्रेट रेट), कंटेनरों की कमी और सप्लाई चेन में रुकावटों के चलते व्यापारियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, किसानों की आजीविका भी खतरे में है। इस बीच सरकार के पोर्ट, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय ने स्थिति को संभालने के लिए जल्द ही बड़ी शिपिंग कंपनियों के साथ बैठक करने का फैसला किया है।
युद्ध के कारण अहम समुद्री रास्ते प्रभावित
एक्सपर्ट के अनुसार, युद्ध के कारण अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हुए हैं, जिससे फ्रेट रेट तेजी से बढ़ गए हैं और वैश्विक लॉजिस्टिक्स सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है। पश्चिम एशिया के लिए निर्यात लगभग रुक चुका है, जबकि अन्य देशों में भी बढ़ती लागत के कारण व्यापार मुश्किल हो गया है।
व्यापार ठप होना बड़ी चिंता का विषय
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) के महासचिव अजय भालोटिया ने बताया कि उन्होंने डीजीएफटी, वाणिज्य मंत्रालय, ईसीजीसी और शिपिंग मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक कर व्यापारियों की समस्याएं रखीं। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि जल्द समाधान निकाला जाएगा। भारत का बासमती चावल निर्यात करीब 6 अरब डॉलर का है, जिसमें से 60-70% निर्यात खाड़ी देशों में होता है। ऐसे में वहां का व्यापार ठप होना बड़ी चिंता का विषय है।
निर्यात बन गया घाटे का सौदा
विशेषज्ञों के मुताबिक, शिपिंग लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। उदाहरण के तौर पर, लंदन भेजे जाने वाले 20-फुट कंटेनर का किराया 800 डॉलर से बढ़कर 2000 डॉलर तक पहुंच गया है, जिससे निर्यात घाटे का सौदा बन गया है। इस समय करीब 14,000 करोड़ रुपये के माल की खेप बंदरगाहों या गंतव्य स्थानों पर फंसी हुई है।
बढ़ सकती है महंगाई
पश्चिम एशिया संकट को लेकर सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक भी बुलाई। बैठक के दौरान, सरकार ने मौजूदा चुनौतियों के बीच व्यापारियों को समर्थन देने के उपायों की रूपरेखा प्रस्तुत की। सरकार ने कुछ राहत उपायों की भी घोषणा की है। ईसीजीसी ने भरोसा दिया है कि बीमा क्लेम 30 दिनों के अंदर निपटाए जाएंगे। साथ ही, बढ़े हुए फ्रेट, डिटेंशन और डेमरेज जैसे अतिरिक्त खर्च भी कवर किए जाएंगे। प्रीमियम दरों में भी कोई बदलाव नहीं होगा। वहीं, निर्यातकों ने सरकार से यह भी मांग की है कि RODTEP योजना, जो 31 मार्च को खत्म हो रही है, उसे अगले वित्त वर्ष तक बढ़ाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शिपिंग लागत में लगातार बढ़ोतरी जारी रही, तो इसका असर वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा और इससे महंगाई भी बढ़ सकती है।