कैलाश मानसरोवर यात्रा पर संकट के बादल? नेपाल ने लिपुलेख को अपना बता भारत-चीन को लिखा पत्र; सुगौली संधि का दिया हवाला

Edited By Updated: 03 May, 2026 10:51 PM

kailash mansarovar yatra in trouble

भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के रास्ते आयोजित होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर अब नेपाल ने अड़ंगा लगा दिया है। नेपाल सरकार ने इस रूट पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों देशों को पत्र लिखकर इसे अपना संप्रभु क्षेत्र बताया है। नेपाल का कहना है...

काठमांडू/नई दिल्ली: भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के रास्ते आयोजित होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर अब नेपाल ने अड़ंगा लगा दिया है। नेपाल सरकार ने इस रूट पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों देशों को पत्र लिखकर इसे अपना संप्रभु क्षेत्र बताया है। नेपाल का कहना है कि यह यात्रा नेपाली ज़मीन से होकर गुजरती है, जिस पर उन्हें गहरी चिंता है।

सुगौली संधि का अलापा राग
नेपाल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, सरकार का रुख बेहद स्पष्ट है कि 1816 की सुगौली संधि के तहत महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का अभिन्न हिस्सा हैं। नेपाल ने कूटनीतिक चैनलों के ज़रिए भारत और चीन को बता दिया है कि लिपुलेख के रास्ते होने वाली किसी भी गतिविधि पर उसका अधिकार है।

तीर्थयात्रा और सड़क निर्माण रोकने की अपील
नेपाल सरकार ने भारत से अपील की है कि इस इलाके में सड़क बनाने, सीमा पर व्यापार करने या तीर्थयात्रा जैसी कोई भी गतिविधि न की जाए। इतना ही नहीं, नेपाल ने चीन को भी आधिकारिक तौर पर सूचित कर दिया है कि लिपुलेख पूरी तरह से नेपाली इलाका है।

भारत ने की है 2026 की यात्रा की तैयारी
गौरतलब है कि भारत के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 के आयोजन का ऐलान किया है। जून से अगस्त के बीच होने वाली इस यात्रा के लिए कुल 20 बैच तय किए गए हैं, जिनमें से 10 बैच उत्तराखंड के लिपुलेख पास और 10 बैच सिक्किम के नाथू ला मार्ग से जाने हैं। प्रत्येक बैच में 50 यात्रियों को शामिल किया जाना है।

कूटनीति से समाधान की उम्मीद
तनाव के बीच नेपाल ने यह भी कहा है कि वह ऐतिहासिक संधियों, मानचित्रों और साक्ष्यों के आधार पर भारत के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंधों को बनाए रखते हुए इस सीमा विवाद को कूटनीतिक तरीकों से हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।

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