Rupee Vs Dollar: इतिहास में सबसे कमजोर रुपया: 1 डॉलर = 92 रुपये, आगे कितना गिरेगा?

Edited By Updated: 30 Jan, 2026 12:30 PM

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भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब यह 92 रुपये के स्तर तक पहुंच गया है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अपनी मुद्रा का टूटना चिंताजनक संकेत होता है, क्योंकि इससे न सिर्फ महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ता है बल्कि आम...

नेशनल डेस्क: भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब यह 92 रुपये के स्तर तक पहुंच गया है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अपनी मुद्रा का टूटना चिंताजनक संकेत होता है, क्योंकि इससे न सिर्फ महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ता है बल्कि आम जनता की जेब पर भी असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और निवेश प्रवाह में बदलाव का भी परिणाम है। जनवरी 2026 में ही रुपये में लगभग 2.3% की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जो इसे पिछले कई महीनों में सबसे कमजोर मुद्रा प्रदर्शन बनाती है। 

रुपया क्यों गिर रहा है?
विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय मुद्रा में गिरावट का बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर अस्थिरता है। दुनिया भर में ट्रेड वॉर, टैरिफ और अन्य आर्थिक तनाव के कारण निवेशक उभरते बाजारों में अपने पैसे लगाने से हिचकिचा रहे हैं। वहीं, अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ती ब्याज दरों ने विदेशी निवेश पर रिटर्न बढ़ा दिया है, जिससे निवेशक अधिक सतर्क हो गए हैं। भारत के चालू खाता घाटे का मुद्दा भी इस गिरावट को बढ़ा रहा है। आयात और निर्यात के बीच अंतर को पूरा करने के लिए जब विदेशी पूंजी प्रवाह कमजोर हो जाता है, तो रुपये पर दबाव बढ़ जाता है और इसकी कीमत टूटने लगती है।

अर्थशास्त्रियों की राय
गुरुवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के बाद प्रेस ब्रीफिंग में चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (CEA) वेंकटरामनन अनंत नागेश्वरन ने स्पष्ट किया कि रुपये की गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं है। जिन देशों का चालू खाता घाटा है, उनकी मुद्राओं में भी कमजोरी देखने को मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि लंबी अवधि में भारतीय रुपये का प्रदर्शन अपेक्षाकृत स्थिर रहा है और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के कारण अस्थायी कमजोरी स्वाभाविक है।

रुपया मजबूत कैसे हो सकता है?
CEA नागेश्वरन ने जोर दिया कि केवल सरकारी हस्तक्षेप से मुद्रा को स्थायी रूप से मजबूत नहीं किया जा सकता। वास्तविक मजबूती विनिर्माण और निर्यात क्षमता बढ़ाने से आती है। मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से चालू खाता स्थिति बेहतर होती है, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है और निवेशकों का भरोसा बढ़ता है। उन्होंने स्विट्ज़रलैंड, जापान, कोरिया, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों के उदाहरण दिए, जहां मजबूत विनिर्माण क्षेत्र की वजह से उनकी मुद्राएं स्थिर रहती हैं।

रुपये की कमजोरी के असर
रुपया कमजोर होने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। भारत के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है। जब रुपये का मूल्य गिरता है, तो तेल और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है। इसके अलावा, विदेशों में पढ़ाई या कारोबार करने वाले लोगों के लिए भी पैसे भेजना महंगा हो जाता है।

 

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