Edited By Sahil Kumar,Updated: 31 Jan, 2026 03:07 PM
वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल के बीच चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद चांदी कुछ ही दिनों में भारी दबाव में आ गई, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, यह गिरावट पिछले कई दशकों में देखे...
नेशनल डेस्कः वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल के बीच चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद चांदी कुछ ही दिनों में भारी दबाव में आ गई, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, यह गिरावट पिछले कई दशकों में देखे गए ऐतिहासिक पैटर्न की याद दिलाती है। बाजार के जानकार मानते हैं कि चांदी का मौजूदा व्यवहार कोई नई कहानी नहीं है, बल्कि पिछले 50 वर्षों में यह पैटर्न कई बार देखा जा चुका है। इतिहास बताता है कि जब भी चांदी असामान्य तेजी के दौर में प्रवेश करती है, उसके बाद बाजार में बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है। ऐसे में सवाल यह है कि मौजूदा गिरावट यहीं थमेगी या अभी और बड़ी टूट बाकी है।
भरोसे और डर के बीच झूलती चांदी
चांदी हमेशा से आर्थिक भरोसे और असुरक्षा के बीच झूलती रही है। जब अर्थव्यवस्था स्थिर होती है, महंगाई काबू में रहती है और सिस्टम पर भरोसा बना रहता है, तब चांदी अपेक्षाकृत शांत रहती है। लेकिन जैसे ही महंगाई, कर्ज, करेंसी की मजबूती और आर्थिक ढांचे को लेकर सवाल उठते हैं, निवेशक चांदी की ओर रुख करते हैं। हर बड़े आर्थिक तनाव के दौर में चांदी ने तेज उछाल दिखाया है, लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि ऐसी तेजी के बाद इसमें उतनी ही गहरी गिरावट भी आई है।
29 जनवरी को दिखा इतिहास का दोहराव
29 जनवरी को चांदी की कीमतें 121–122 डॉलर प्रति औंस के दायरे तक पहुंच गईं। यह स्तर निचले भावों से करीब 930 प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न दर्शाता है। लेकिन इसके तुरंत बाद बाजार में जोरदार बिकवाली देखने को मिली और कुछ ही दिनों में चांदी फिसलकर करीब 84 डॉलर के आसपास आ गई।
महज दो कारोबारी दिनों में करीब 30 प्रतिशत की गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। अब सवाल यही उठ रहा है कि अगर यह गिरावट इतिहास के मुताबिक आगे बढ़ती है, तो चांदी कहां तक टूट सकती है।
1970–80: जब रिकॉर्ड तेजी के बाद आई ऐतिहासिक गिरावट
1975 में चांदी की कीमत करीब 3.8 डॉलर प्रति औंस थी। उस दौर में महंगाई, तेल संकट, डॉलर पर कमजोर भरोसा और आर्थिक अनिश्चितता ने चांदी को जबरदस्त रफ्तार दी। 1979–80 तक चांदी 48–50 डॉलर के स्तर पर पहुंच गई, यानी करीब 1,200 प्रतिशत की छलांग।
लेकिन जैसे ही अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को सख्त किया, डॉलर मजबूत हुआ और महंगाई पर काबू पाया गया, चांदी की कीमतें बुरी तरह टूट गईं। आने वाले वर्षों में इसमें लगभग 89 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
2001–2011: फिर दोहराई गई वही कहानी
2001 में चांदी करीब 4 डॉलर प्रति औंस के आसपास थी। डॉट-कॉम बबल, 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट, बैंकों की विफलता और केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर नकदी डालने से निवेशकों का रुझान एक बार फिर चांदी की ओर हुआ।
2011 तक चांदी की कीमतें लगभग 50 डॉलर तक पहुंच गईं, यानी करीब 1,100 प्रतिशत की तेजी। लेकिन इसके बाद लंबा और गहरा करेक्शन देखने को मिला, जिसमें कीमतें करीब 70 प्रतिशत तक टूट गईं।
2026 की शुरुआत में फिर बदला ट्रेंड
कोरोना महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में वही हालात बने—कम ब्याज दरें, बढ़ता कर्ज और भविष्य को लेकर अनिश्चितता। 2020 में चांदी 11–12 डॉलर तक गिर गई थी, लेकिन इसके बाद इसमें जबरदस्त उछाल आया। 29 जनवरी 2026 को चांदी 120 डॉलर के ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गई, जो करीब 930–950 प्रतिशत का रिटर्न दर्शाता है। यही वह स्तर है, जहां इतिहास में हर बार चांदी पर दबाव बढ़ता दिखा है। अगले ही दिन भारी बिकवाली के साथ 31 जनवरी को चांदी 84 डॉलर पर बंद हुई, यानी दो दिनों में करीब 30 प्रतिशत की बड़ी गिरावट।
अभी और कितनी गिर सकती है चांदी?
पिछले पांच दशकों के टेक्निकल चार्ट्स पर नजर डालें तो एक साफ पैटर्न उभरकर सामने आता है। हर बड़े बूम के बाद चांदी में सिर्फ हल्का सुधार नहीं, बल्कि गहरी गिरावट आती है। आमतौर पर यह करेक्शन 65 से 75 प्रतिशत तक का होता है, जिसके बाद ही बाजार में कुछ स्थिरता आती है।