केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के टकराव का खामियाजा भुगत रहे फरियादी

Edited By Updated: 24 Dec, 2022 05:01 AM

complainants are bearing the brunt of confrontation between center and the sc

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से टकराव गहराता दिख रहा है, खास तौर पर केंद्रीय कानून मंत्री के उस बयान के बाद जिसमें उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम को लेकर...

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से टकराव गहराता दिख रहा है, खास तौर पर केंद्रीय कानून मंत्री के उस बयान के बाद जिसमें उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

कॉलेजियम सिस्टम वह प्रक्रिया है जिससे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और तबादले किए जाते हैं। ताजा बहस तब शुरू हुई जब 25 नवंबर को केंद्रीय कानून मंत्री किरन रिजिजू ने जजों की नियुक्ति करने की पूरी प्रक्रिया को ही संविधान से परे या एलियन बता दिया। केंद्रीय कानून मंत्री ने याद दिलाने की कोशिश की कि  सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समझ और कोर्ट के ही आदेशों को आधार बनाते हुए कॉलेजियम बनाया है। केंद्रीय कानून मंत्री की यह बात दुरुस्त है कि संविधान में कॉलेजियम का कहीं जिक्र नहीं है। 

कॉलेजियम भारत के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों का एक समूह है। ये पांच लोग मिलकर तय करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में कौन जज होगा। ये नियुक्तियां हाई कोर्ट से की जाती हैं और सीधे तौर पर भी किसी अनुभवी वकील को भी हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया जा सकता है। हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम की सलाह से होती है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और राज्य के राज्यपाल शामिल होते हैं। कॉलेजियम बहुत पुराना सिस्टम नहीं है और इसके अस्तित्व में आने के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसले जिम्मेदार हैं, जिन्हें जजेस केस के नाम से जाना जाता है। सरकार और न्यायपालिका के बीच तनातनी की शुरूआत साल 2014 से हुई। 

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब देश में एन.डी.एन. सरकार बनी तो केंद्र सरकार साल 2014 में ही संविधान में 99वां संशोधन करके नैशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमैंट कमीशन (एन.जे.ए.सी.) अधिनियम लेकर आई। इसमें सरकार ने कहा कि चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की जगह अब एन.जे.ए.सी. के प्रावधानों के तहत काम हो। अक्तूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने इस नैशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमैंट्स कमीशन अधिनियम को ‘संविधान के आधारभूत ढांचे से छेड़छाड़’ बताते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में संविधान में न्यायपालिका और चीफ जस्टिस की राय को तरजीह देने की बात कही गई है और सरकार का इस तरह का दखल संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। 

न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम और सरकार के बीच गतिरोध को देखते हुए संसद की एक समिति ने कहा है कि वह केंद्रीय कानून मंत्रालय के न्याय विभाग की टिप्पणियों से सहमत नहीं है कि उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्तियों का समय इंगित नहीं किया जा सकता। समिति ने कहा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों में उन समय-सीमाओं का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे रिक्तियों को भरने में देरी हो रही है। कॉलेजियम की सिफारिशों पर अमल के लिए डैड लाइन न होने की वजह से सिफारिशों को लागू करने में कई बार देरी होती है तो कई बार केंद्र गजब की तेजी से उन पर अपनी सहमति देकर वापस लौटा देता है। 

कॉलेजियम की जिस सिफारिश पर केंद्र ने सबसे ज्यादा देरी से अमल किया वह जस्टिस के.एम. जोसेफ को लेकर है। कॉलेजियम की सिफारिश के तकरीबन सात माह बाद उनकी नियुक्ति पर केंद्र ने मोहर लगाई थी। जस्टिस इंदू महरोत्रा के साथ उनके नाम की सिफारिश 11 जनवरी 2018 को की गई थी। लेकिन इंदू महरोत्रा की फाइल तो तुरंत अप्रूव हो गई अलबत्ता जोसेफ को नियुक्ति के लिए तकरीबन 7 माह तक इंतजार करना पड़ा। केंद्र की तरफ से अप्रैल में उनकी फाइल वापस लौटा दी गई थी। लेकिन जब ने तीखा विरोध जताया तो जुलाई में उनकी फाइल पर केंद्र ने मोहर लगाई थी। 

इसी तरह जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जे.बी. परदीवाला के लिए भी कॉलेजियम की फाइल दो दिनों में ही मंजूर कर ली गई। कॉलेजियम ने 26 अगस्त 2021 को सबसे ज्यादा 9 नियुक्तियों की सिफारिश की थी। इन मामलों को नौ दिनों में ही मंजूर कर लिया गया। ऐसे कई मामले हैं जहां केंद्र ने ज्यादा हीलाहवाली न करते हुए कॉलेजियम की सिफारिशों को कुछ दिनों के भीतर ही मंजूर कर लिया। 

मुद्दा बेशक केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकारों का हो किन्तु इसमें पिस आम लोग रहे हैं, जिन्हें शीघ्र न्याय की दरकार है। न्याय मिलने में देरी न्याय नहीं मिलने के समान है। इस न्यायिक सिद्धांत की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हालत यह है न्यायाधीशों के पद रिक्त होने से फरियादियों को न्याय मिलने में विलंब हो रहा है। 30 नवंबर, 2022 तक हाईकोर्ट के जजों की स्वीकृत क्षमता 1108 है। लेकिन फिलहाल 776 जज हैं और 332 रिक्तियां हैं। हाईकोर्ट ने 146 (44 फीसदी) सिफारिशें की हैं जो सरकार और सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। स्वीकृत संख्या के अनुसार, प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 20 न्यायाधीश हैं, जो बेहद कम हैं। 

चार करोड़ मामले निचली अदालतों में जबकि 42 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। उच्चतम न्यायालय में भी 68435 मामले लंबित हैं। देश के संवैधानिक ढांचे और लोकतांत्रिक मूल्यों को बरकरार रखने की दरकार है कि केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की भर्ती के मुद्दे पर बने टकराव को खत्म करे, ताकि पीड़ितों को शीघ्र न्याय सुलभ हो सके।-योगेन्द्र योगी

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