चांद पर पहुंचता भारत और सीवर में मरते सफाई कर्मी

Edited By Updated: 01 Apr, 2022 04:53 AM

india reaching the moon and the sanitation workers dying in the sewer

किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार का दायित्व होता है कि वह प्रत्येक नागरिक को गरिमामय जीवन उपलब्ध कराए। लेकिन भारत में आज भी सीवर कर्मियों के जीवन के साथ खिलवाड़ बदस्तूर जारी

किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार का दायित्व होता है कि वह प्रत्येक नागरिक को गरिमामय जीवन उपलब्ध कराए। लेकिन भारत में आज भी सीवर कर्मियों के जीवन के साथ खिलवाड़ बदस्तूर जारी है। हाल ही में राजस्थान के बीकानेर और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पुणे शहर में सैप्टिक टैंक को साफ करने के दौरान 4-4 मजदूरों की दम घुटने की वजह से दर्दनाक मौत हो गई। लखनऊ में भी सीवर साफ करने उतरे 2 कर्मचारियों की मौत हो गई। ये कर्मचारी लगभग 3 घंटे तक सीवर लाइन में फंसे रहे। 

कहने को देशभर में स्वच्छता मिशन का शोरगुल सुनाई पड़ रहा है, लेकिन लगता है कि इसका उद्देश्य केवल शौचालय निर्माण करने तक ही सीमित होकर रह गया है। सरकार स्वच्छ भारत मिशन की फ्लैगशिप योजना के तहत शौचालय निर्माण के लिए कई हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण सीवर कर्मियों की सुरक्षा आज भी अधर में झूल रही है। 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर, 2019 को मैला ढोने और बिना किसी यंत्र के सीवेज चैंबर की सफाई के मामले में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि दुनिया में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है जो लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर में भेजता हो। कोर्ट ने यह भी कहा था कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी जातीय शोषण व्यवस्था कायम है। आखिर सफाई कर्मियों को मास्क और ऑक्सीजन सिलैंडर जैसे सुरक्षा यंत्र क्यों नहीं दिए जा रहे? 

उल्लेखनीय है कि देश में 6 दिसम्बर, 2013 से हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम लागू होने के बाद हाथ से सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई प्रतिबंधित है। कानून कहता है कि सभी स्थानीय प्राधिकरणों को हाथ से मैला उठाने की व्यवस्था खत्म करने के लिए सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई हेतु आधुनिक तकनीकें अपनानी होंगी। लेकिन विडंबना यह है कि कानून बनने के बाद कई राज्यों में मैनुअल स्कैवेंजर्स की संख्या बढ़ गई है। 

सफाई कर्मियों की सुरक्षा से जुड़े तमाम प्रयासों और दावों के बावजूद पिछले 3 वर्षों में सीवर की सफाई करने के दौरान कुल 271 लोगों की जान चली गई, जिनमें से 110 मौतें सिर्फ 2019 में हुईं। इसी तरह 2018 में 68 और 2017 में 193 मौतें हुईं। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की ओर से सूचना के अधिकार के तहत प्रदान किए गए आंकड़ों से यह जानकारी सामने आई है। 

दरअसल सफाई के लिए आधुनिक मशीनों की सुविधाएं नहीं होने और ज्यादातर जगहों पर अनुबंध की व्यवस्था होने से सफाई कर्मियों की मौतें हो रही हैं। आयोग के आंकड़े के अनुसार पिछले 3 वर्षों में सबसे ज्यादा 50 मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं। तमिलनाडु, हरियाणा और दिल्ली में 31-31 और महाराष्ट्र में 28 सफाई कर्मियों की मौत हुई। कुछ समय पहले हुए एक सर्वे में बताया गया था कि सीवर की सफाई में लगे लोगों में से 49 फीसदी को सांस संबंधी तकलीफ और 11 प्रतिशत से अधिक को त्वचा संबंधी अनेक परेशानियां हो जाती हैं। 

गटर/सीवर साफ करने वाले 90 फीसदी सफाई कर्मचारियों की 60 की उम्र से पहले ही मौत हो जाती है। उनके पास कोई उपकरण नहीं होता, जिससे पता लगाया जा सके कि सीवर में जहरीली गैस है या नहीं। ऐसे में ये हादसों के शिकार हो जाते हैं और अगर हादसों से बच जाते हैं तो इनके शरीर में बीमारियां घर कर जाती हैं जिससे ये भरी जवानी में ही मौत के शिकार हो जाते हैं। 

स्वच्छ भारत अभियान के तहत पूरे देश में लाखों शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए लाखों की संख्या में सैप्टिक टैंक एवं ड्रेन बनाए जा रहे हैं। जितने अधिक शौचालय होंगे, उतने अधिक मैनुअल स्कैवेेंंजिंग होंगे और उतनी ही अधिक मौतें। एक तरफ सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत बजट आबंटन बढ़ा रही है तो दूसरी ओर मैनुअल स्कैवेंजरों के पुनर्वास के लिए वर्ष 2013-14 में सरकार ने 570 करोड़ रुपए का बजट आबंटित किया था, जिसे वर्ष 2017-18 में घटा कर सिर्फ 5 करोड़ कर दिया। 

विचारणीय है कि जहां देश महाशक्ति बनने जा रहा है, हमने तकनीकी विकास किया है और चांद पर पहुंच रहे हैं, वहीं इन सफाई कर्मियों की सीवर में मौतें रोकने का बंदोबस्त हम नहीं कर पा रहे। इन सीवर सफाई कर्मियों को इस काम से मुक्त करने की जितनी जरूरत है, उतनी ही इनके लिए काम का पुनर्वास सुनिश्चित करने की भी दरकार है। साथ ही सैप्टिक टैंक में होने वाली इन दर्दनाक मौतों की रोकथाम के लिए यांत्रिक उपायों, मसलन सकर मशीन जो मल को सबमर्सिबल पंप के माध्यम से खींच कर बाहर निकालती है, को उपयोग में लाने की आवश्यकता है। इस काम के लिए रोबोट की मदद भी ली जा सकती है। 

सीवर की सफाई करने के लिए जो मजदूर भूमिगत नालों में उतरते हैं, उन्हें बहुत कम पैसे दिए जाते हैं। ठेके पर सफाईकर्मी रखने की बजाय सरकारों को इनके लिए उचित वेतन, सुरक्षा उपकरणों व प्रशिक्षण के प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। दुनिया के कई देशों में सीवरों में कर्मचारियों को उतार कर हाथ से मल साफ कराने की व्यवस्था समाप्त की जा चुकी है तथा इसकी बजाय सीवर इंस्पैक्शन के लिए कैमरों व अन्य उपकरणों की मदद ली जा रही है। फिर दूरी के हिसाब से सफाई उपकरणों से ब्लॉकेज को दूर किया जाता है। 

समझना होगा कि स्वच्छता मिशन का अंतिम लक्ष्य तब तक अधूरा है, जब तक देश में सार्वजनिक स्वच्छता के कार्यों में लगे नागरिकों के जीवन में आधारभूत परिवर्तन लाकर उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अनुभव नहीं कराया जाता।-देवेन्द्रराज सुथार 
 

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