नेपाल आर्थिक विकास में भारत से सहयोग चाहता है या चीन की डंपिंग ग्राऊंड बनना

Edited By Updated: 02 Feb, 2023 05:24 AM

nepal wants cooperation from india in economic development

चीन को हमेशा से इस बात का डर सता रहा है कि अगर उसे किसी देश से मात मिल सकती है तो वह है भारत, क्योंकि भारत में वह सब कुछ है, जो इस देश को एक सुपरपावर बना सकता है और दुनिया का रुख अगर भारत की तरफ मुड़ गया तो चीन को कोई नहीं पूछेगा।

चीन को हमेशा से इस बात का डर सता रहा है कि अगर उसे किसी देश से मात मिल सकती है तो वह है भारत, क्योंकि भारत में वह सब कुछ है, जो इस देश को एक सुपरपावर बना सकता है और दुनिया का रुख अगर भारत की तरफ मुड़ गया तो चीन को कोई नहीं पूछेगा। भारत के आगे बढऩे की वजह लोकतंत्र, पारदर्शी नीतियां, भारी जनसंख्या के कारण बड़ा बाजार, पेशेवर लोगों की अधिकता के कारण विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में दबदबा बनाने की पूरी क्षमता और व्यापार बढ़ाने के लिए अनुकूल वातावरण सब कुछ है। 

भारत को घेरने के लिए चीन ने भारत के पड़ोसियों से स्वार्थपरक दोस्ती साधने में भारी सफलता पाई लेकिन समय के साथ उसकी कलई भी खुल गई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। श्रीलंका, पाकिस्तान दोनों देश चीन के कर्जदार हो चुके हैं, इसके बाद भारत के दो प्रमुख पड़ोसियों की आर्थिक हालत अब सही नहीं है क्योंकि चीन के साथ इनकी नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। इनमें एक है भारत के पूर्व में बसा बंगलादेश तो दूसरा है उत्तर में हिमालयी क्षेत्र में बसा नेपाल। 

चीन इन दिनों भारत को घेरने के लिए नेपाल को साधने में जुटा हुआ है। इसके लिए उसने नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करवाई और पैसों के दम पर उनकी सरकार भी खड़ी कर दी। समय का फ़ायदा उठाते हुए नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने खुशी से चीन के इशारों पर नाचना बेहतर समझा, इसके साथ ही चीन ने नेपाल के लोगों में भारत के खिलाफ जहर भरना भी शुरू कर दिया। चीन ने भारत को तनाव में रखने के लिए भी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का सहारा लिया, जिसके चलते कभी नेपाल के कम्युनिस्ट पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली भगवान राम को नेपाली बताते हैं तो कभी भगवान बुद्ध को भी नेपाली बता देते हैं, नेपाली जनता को भारत के खिलाफ भड़काने का काम भी करते हैं। 

जब इससे भी बात नहीं बनी तो चीन के इशारे पर के.पी. शर्मा ओली ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में भारतीय सीमा से लगने वाले नेपाली क्षेत्र लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का हिस्सा बताना शुरू कर दिया और नेपाल के संविधान में संशोधन कर इन जगहों पर नेपाल का दावा ठोकते हुए यह बयानबाजी की कि नेपाल के इन तीनों शहरों पर भारत ने अपना कब्जा जमा लिया है और नेपाल को भारत से इन्हें छीन लेना चाहिए। हालांकि के.पी. शर्मा ओली के इस बयान पर भारत ने संयम बरतते हुए शांति बनाए रखी। 

इस समय नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड हैं, वह भी ओली की तरह कम्युनिस्ट हैं। जहां ओली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ओली गुट के प्रमुख हैं, वहीं प्रचंड नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी प्रचंड गुट के अध्यक्ष हैं। यही वजह है कि प्रचंड भी वही काम कर रहे हैं जो ओली करते थे। नेपाल में हुए इस बार के चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो दोनों कम्युनिस्ट नेताओं ने मिलकर नेपाल की सत्ता पर कब्जा कर लिया, जिससे चीन की बांछें खिल गईं। 

इस बीच नेपाल के पोखरा शहर में चीन की फंडिंग से एक एयरपोर्ट बना, लेकिन इसका सारा क्रैडिट चीन ने खुद ले लिया, जिससे नेपाल को गहरा धक्का लगा, नेपाली पी.एम. इससे नाराज भी हुए लेकिन जब सत्ता का सुख मिले और फंडिंग चीन से हो रही है तो फिर चिंता किस बात की। इसी बीच नेपाल में एक और घटना घटी। चीन ने जिस तरह से नेपाल को भारत और चीन के बीच एक जंग का मैदान बनाया है उसके बीच भारत ने खुद से नेपाल के लोगों को जोडऩे के लिए भारत के रक्सौल से काठमांडू तक एक रेलवे लाइन बनाने के काम को तेजी से आगे बढ़ा दिया है, जिससे भारत में रहने वाले लाखों नेपाली लोगों को अपने देश जाने और साथ ही भारत से नेपाल सामान पहुंचाने में भी आसानी होगी। 

चीन भारत के इस कदम से आग बबूला हो उठा और उसने नेपाल में अपनी चाल बदल डाली और जवाब में केरुंग-काठमांडू रेलवे लाइन की जांच और सर्वे का काम शुरू कर दिया है। चीन ने भारत को जवाब देने के लिए यह कदम हाल ही में तब उठाया, जब के.पी. ओली के समर्थन से नेपाल में प्रचंड की सरकार बनी। इससे पहले देऊबा के समय में चीन नेपाल में अपनी रणनीतिक चालों पर पुनर्विचार कर रहा था। चीन की केरुंग-काठमांडू रेलवे लाइन को हिमालय के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर बनाया जाएगा। इस पर बहुत सी सुरंगें और रेलवे पुल बनाए जाएंगे, जो बेहद खर्चीला साबित होगा। 

चीन यह सारा खर्चा पहले तो खुद करेगा लेकिन बाद में इस बोझ को नेपाल के कंधों पर डाल कर श्रीलंका की तरह अपने कर्ज के जाल में फंसा लेगा। लेकिन नेपाल चाहता है कि चीन नेपाल को कर्ज न देकर आर्थिक मदद दे, जिस पर दोनों देशों में बात बिगड़ सकती है क्योंकि दूसरे शब्दों में नेपाल चीन से दान मांग रहा है, जोकि चीन की संस्कृति का हिस्सा नहीं है। चीन जहां पर भी अपने पैसे निवेश करता है, वहां से सूद समेत अपने पैसे निकालना भी जानता है। 

भारत और चीन द्वारा नेपाल में रेलवे लाइनों के निर्माण की खबर को लेकर नेपाल के प्रमुख अखबार काठमांडू टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि नेपाल भारत और चीन के बीच जंग का मैदान बन गया है। वहीं भारत ने नेपाल में सर्वे के बाद जमीनी कार्रवाई बहुत तेजी से शुरू कर दी है। इस परियोजना पर कोंकण रेलवे ने काम भी शुरू कर दिया है और बहुत जल्दी रक्सौल से काठमांडू तक रेलवे लाइन बिछाने का काम भी शुरू कर दिया जाएगा। इस रेलवे लाइन के बनने के बाद सबसे अधिक लाभ नेपाली जनता को मिलेगा, जो बड़ी संख्या में भारत में आकर नौकरी, काम-धंधा और अपना व्यापार चलाते हैं। 

चीन जो नेपाल में अपनी रेलवे लाइन महत्वाकांक्षी परियोजना बी.आर.आई. के तहत चलाना चाहता है, वह नेपाल में अपने चीनी सामानों को डम्प करने के लिए इस रेलवे लाइन का निर्माण करवा रहा है क्योंकि किसी भी नेपाली नागरिक को चीन में उस तरह से जाने की इजाजत नहीं है जैसे वे भारत में आकर अपना काम धंधा शुरू करते हैं। चीन की रेलवे लाइन से नेपाल को नुक्सान और डमिं्पग ग्राऊंड बनने से ज्यादा कुछ भी नहीं मिलेगा। 

दरअसल चीन नेपाल के जरिए भारत के बिहार, बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने सामान की डम्पिंग करना चाहता है क्योंकि नेपाली लोगों की भारत में एंट्री बिना पासपोर्ट के होती है। साथ ही व्यापार पर भी कोई रोक-टोक नहीं है। अब यह नेपाल को सोचना है कि वह भारत की रेलवे लाइन अपने देश में देखना चाहता है, जिससे उसके आर्थिक विकास में भारत से सहयोग मिलेगा, या चीन की डम्पिंग ग्राऊंड बनना चाहता है।

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