दमनात्मक कानून हमने खुद अपने को तोहफे में दिए हैं

Edited By ,Updated: 16 May, 2022 04:17 AM

oppressive laws we have given ourselves as gifts

सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून पर रोक लगा दी है तथा केंद्र सरकार ने भी कहा है कि प्रधानमंत्री कोलोनियल काल के इस कानून को खत्म करना चाहती है। यह एक अच्छा पल है। कानून कहता है कि जो कोई भी शब्दों द्वारा, चाहे बोलकर या लिखित में अथवा हस्ताक्षर करके...

सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून पर रोक लगा दी है तथा केंद्र सरकार ने भी कहा है कि प्रधानमंत्री कोलोनियल काल के इस कानून को खत्म करना चाहती है। यह एक अच्छा पल है। कानून कहता है कि जो कोई भी शब्दों द्वारा, चाहे बोलकर या लिखित में अथवा हस्ताक्षर करके या खुद सामने आकर या किसी भी तरीके से नफरत अथवा अवमानना पैदा करने का प्रयास करता है या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति अलगाव को प्रेरित करता है तो उसे आजीवन कैद का दंड दिया जाना चाहिए। 

आर्टिकल-14 डॉट कॉम नामक वैबसाइट में सरकार ने कानून के दुरुपयोग के मामलों का संकलन करने का अच्छा कार्य किया है तथा इस मामले को जनता के सामने लाने के लिए जिम्मेदार है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पहले तो देशद्रोह के मामले अभी भी सरकार द्वारा दायर किए जा सकते हैं और दूसरे, बहुत से अन्य कानून हैं जो समस्याएं पैदा करते हैं और उनका दुरुपयोग किया जा सकता है। ये दोनों ही चीजें सच हैं। हालांकि हमें खुश होना और अपने मन को सामान्य दिशा की ओर ले जाना चाहिए। जब यह न्यायपालिका के ध्यान में आया कि कुछ कानून 19वीं शताब्दी के लोकतंत्र में प्रासंगिक नहीं हैं तो परेशानी पैदा करने वाले कानून समाप्त हो जाएंगे। देश जब ऐसी सच्चाइयों का एहसास करते हैं तो खुद में आंतरिक तौर पर सुधार करते हैं। 

भारत में ऐसे कई कानून हैं जिनकी कानून में हमें दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की गारंटी की रोशनी में समीक्षा करने की जरूरत है। और देशद्रोह केवल एक कोलोनियल किस्म का कानून नहीं है जिसका हम सामना करते हैं। रोलैट एक्ट जिसका गांधी जी ने विरोध किया था और जलियांवाला बाग के नरसंहार का कारण बना, कानून के शासन के मूलभूत नियमों के विपरीत था। इसके अंतर्गत लोगों को बिना दोष अथवा मुकद्दमा चलाए हिरासत में लिया जा सकता था तथा ज्यूरी ट्रायल्स की बजाय जजों द्वारा इन-कैमरा ट्रायल्स के पक्ष में था। इसे प्रशासनिक हिरासत कहा जाता है, अर्थात किसी को बिना अपराध किए जेल में रखना, महज इस संदेह में कि वह भविष्य में अपराध करेगा। 

मगर आज भारत में ऐसे कई कानून हैं। 2015 में भारत में 3200 से अधिक लोग ‘प्रशासनिक हिरासत’ में रखे गए। गुजरात में 1984 का समाज विरोधी गतिविधियों से बचाव का कानून है। यह बिना आरोप लगाए अथवा मुकद्दमा चलाए एक वर्ष के लिए आरोपी को हिरासत में रखने की शक्ति प्रदान करता है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है जो ‘लोगों की भारत की सुरक्षा, विदेशी शक्तियों के साथ भारत के संबंधों के लिए किसी भी तरीके से हानिकारक गतिविधियों से बचाव करता है’। 

इस कानून का इस्तेमाल मध्यप्रदेश में पशुओं की तस्करी तथा उनके वध के आरोपी मुसलमानों को जेल में डालने के लिए किया गया है। तमिलनाडु में 1982 का कानून है जो शराब तस्करों की खतरनाक गतिविधियों, ड्रग तस्करों, गुंडों, वन कानूनों का उल्लंघन करने वालों, अनैतिक तस्करी, रेत माफिया, यौन उत्पीड़नों तथा वीडियो पाइरेट्स से बचाव करता है। ये कानून राज्य को ऐसे मामलों के किसी भी आरोपी को बिना मुकद्दमा चलाए अथवा दोष सिद्धि के जेल में डालने की ताकत प्रदान करता है। कर्नाटक में एसिड हमलावरों की खतरनाक गतिविधियों, शराब तस्करों, पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने वालों, डिजिटल अपराधियों, ड्रग तस्करों, जुआरियों, गुंडों अनैतिक तस्करी करने वालों, जमीन हड़पने वालों, धन शोधकों, यौन प्रताड़कों तथा वीडियो या ऑडियो पाइरेट्स से बचाव का 1985 का कानून है। जन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ऐसे किसी भी अपराध की आशंका में पकड़े गए व्यक्ति को बिना आरोप लगाए अथवा मुकद्दमा चलाए 12 महीनों तक जेल में रखा जा सकता है। 

असम में प्रिवैंटिव डिटैंशन एक्ट 1980 है। यह किसी व्यक्ति को बिना आरोप लगाए अथवा मुकद्दमा चलाए दो वर्षों के लिए जेल भेज सकता है। बिहार में कंजर्वेशन ऑफ फॉरेन एक्सचेंज एंड प्रिवैंशन ऑफ स्मगलिंग एक्ट 1984 है। यह कानून वस्तुओं की तस्करी करने अथवा वस्तुओं की स्मगलिंग को बढ़ावा देने अथवा तस्करी की वस्तुओं के परिवहन अथवा उसे रखने में शामिल या तस्करी की वस्तुओं का लेन-देन करने वाले किसी भी व्यक्ति को बिना आरोप लगाए अथवा मुकद्दमा चलाए 2 वर्षों के लिए जेल में रखने की इजाजत देता है। 

जम्मू-कश्मीर में तीन कानून हैं, एक बिना आरोप अथवा मुकद्दमे के 6 महीनों के लिए हिरासत में रखने की इजाजत देता है, दूसरा एक वर्ष के लिए तथा तीसरा 2 वर्षों के लिए। पश्चिम बंगाल में हिंसक गतिविधियों से बचाव का कानून (1970) है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारों को एन.एस.ए. के अंतर्गत नियमित रूप से जेल की जाती है और उनकी रिपोॄटग के लिए एक वर्ष के लिए जेल में रखा जाता है। जैसा कि हम तिथियों से देख सकते हैं, इनमें से कोई भी तथाकथित कोलोनियल कानून नहीं है। ये वे कानून हैं जो हमने खुद अपने को तोहफे में दिए हैं। प्रत्येक राज्य उनका उदारतापूर्वक इस्तेमाल करता है और न्यायपालिका की ओर से इसका कोई प्रतिरोध नहीं किया जाता। इन दिनों हमने भारतीय लोगों के कुछ वर्गों का देश विरोधी शब्द का इस्तेमाल करते हुए दुश्मन के तौर पर वर्गीकरण कर दिया है। 

आज जलियांवाला बाग किस्म के इकट्ठे नहीं होते और यदि हमने ऐसे कानूनों के खिलाफ ऐसा किया होता तो हमें देश विरोधी कहा जाता है। मगर यह इस तथ्य को नहीं बदलता कि ये कानून अप्रासंगिक हो चुके हैं जैसे कि एक शताब्दी पूर्व रोलैट एक्ट था। एक बार जब एक राष्ट्र के तौर पर हमें यह एहसास हो जाता है और विशेषकर उच्च न्यायपालिका में तो हम आशा कर सकते हैं कि किसी न किसी तरह का सुधार होगा जैसा कि हमने अभी देशद्रोह के मामले में देखा है।-आकार पटेल

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