स्टील के दाम बेलगाम, हाईवे से हाऊसिंग व मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर पर संकट

Edited By Updated: 20 May, 2026 04:20 AM

steel prices are soaring highways are threatening housing manufacturing sectors

क्या  बीते 3 महीने से ईरान व अमरीका-इसराईल के बीच तनाव के चलते भारत में स्टील के दाम आसमान छू रहे हैं? एक मकान बनाने से लेकर देश के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजैक्ट निर्माताओं व छोटे कारोबारियों में इस बात को लेकर ङ्क्षचता है कि जब कच्चे माल पर लागत...

क्या बीते 3 महीने से ईरान व अमरीका-इसराईल के बीच तनाव के चलते भारत में स्टील के दाम आसमान छू रहे हैं? एक मकान बनाने से लेकर देश के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजैक्ट निर्माताओं व छोटे कारोबारियों में इस बात को लेकर ङ्क्षचता है कि जब कच्चे माल पर लागत नहीं बढ़ी तब स्टील निर्माता कंपनियों ने तैयार माल के दाम में 30 प्रतिशत तक का इजाफा क्यों किया? मनमाने दाम का फायदा चंद स्टील कंपनियों के रिकॉर्ड मुनाफे में साफ दिखाई दे रहा है। पश्चिमी-एशिया में राजनीतिक तनाव व होर्मुज संकट के चलते जहां दुनियाभर की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है, वहीं बीते जनवरी से मार्च तक के 3 महीनों में 1200 प्रतिशत से अधिक मुनाफा कमा चंद स्टील कंपनियां चांदी कूट रही हैं। महंगे स्टील के कारण छोटे उद्योगों पर पड़ी महंगाई की मार की चपेट में वह एक आम आदमी है, जिसे सिर पर अपनी छत का सपना साकार करना है।

तीन महीने पहले हॉट रोल्ड कॉयल (एच.आर.सी.) 47,000 रुपए प्रति टन से बढ़कर 60,000 रुपए व कोल्ड रोल्ड कॉयल (सी.आर.सी.) के दाम 67,000 और टी.एम.टी. सरिया 63,000 रुपए प्रति टन तक हो गया है। बढ़ी कीमतें भारत के औद्योगिक, इंफ्रास्ट्रक्चर एवं कंस्ट्रक्शन अर्थव्यवस्था की एक गहरी समस्या की ओर इशारा करती हैं।

चंद स्टील मिलों की चांदी : बढ़ी कीमतों की असली वजह सिर्फ घरेलू बाजार नहीं, बल्कि सरकारी नीति भी है। अप्रैल 2025 में भारत ने चीन और अन्य एशियाई देशों से सस्ते स्टील का इंपोर्ट घटाने के लिए कुछ स्टील उत्पादों पर 12 प्रतिशत सेफगार्ड ड्यूटी लगाई। चीन से बढ़ते स्टील इंपोर्ट को घटाने के लिए देश के बड़े स्टील मिल मालिकों ने दबाव बनाया कि भारी सबसिडी वाले विदेशी स्टील से उनका मुनाफा घट रहा है। इसलिए सेफगार्ड ड्यूटी को देश की स्टील मिलों के हक में औद्योगिक नीति के तौर पर पेश किया गया। चंद बड़ी स्टील मिलों का मकसद पूरा हुआ। देश में इंपोर्ट घटा तो यहां की स्टील मिलों ने बेलगाम दाम बढ़ाए। वर्ष 2026 की शुरुआत से ही स्टील कंपनियों के माॢजन तेजी से बढ़े। यह चंद बड़ी स्टील केंपनियों के राजस्व नतीजों में साफ दिखाई दे रहा है। 

वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में जे.एस.डब्ल्यू. स्टील ने मुनाफे में रिकॉर्ड 1282 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की । वर्ष 2025 के जनवरी से मार्च के दौरान 1531 करोड़ रुपए का मुनाफा इस साल जनवरी से मार्च दौरान बढ़कर 19,243 करोड़ रुपए हो गया। टाटा स्टील का माॢजन भी जबरदस्त उछाल के साथ वित्त वर्ष 2024-25 की आखिरी तिमाही के 1,301 करोड़ रुपए से 125 प्रतिशत बढ़कर  वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में 2,926 करोड़ रुपए जा पहुंचा। स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने भी 46.7 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ बीते वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में 1836 करोड़ रुपए लाभ अर्जित किया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 की चौथी तिमाही में यह 1251 करोड़ रुपए था।  

बढ़ी मांग ने दबाव बढ़ाया : इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि घरेलू बाजार में स्टील की बढ़ी मांग ने भी बेलगाम दाम की समस्या को बढ़ाया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर, शहरीकरण, रेलवे विस्तार, आवास निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर की बदौलत भारत में स्टील खपत तेजी से बढ़ रही है। मैटल इंडस्ट्री अपनी जरूरत का 85 से 90 प्रतिशत कोयला आस्ट्रेलिया से इंपोर्ट करती है। 2026 की शुरुआत में क्वींसलैंड में बाढ़ जैसी मौसम की मार से ऑस्ट्रेलियाई हार्ड कोकिंग कोल की बैंचमार्क कीमतें तेजी से चढ़ीं। पश्चिमी एशिया में राजनीतिक तनाव के कारण शिपिंग रूट और इंश्योरैंस प्रीमियम के कारण समुद्री मार्ग से माल ढुलाई पर लागत बढ़ी है, पर इसकी वजह से घरेलू बाजार में स्टील के दाम में बेतहाशा बढ़ोतरी का कोई तुक नहीं। 

मुठ्ठी भर मिलों की मोनोपली : भारत का स्टील उद्योग मुठ्ठीभर मिल मालिकों के हाथ में है। ऐसे बाजार में स्टील इंपोर्ट पर सेफगार्ड ड्यूटी लगाने से ऐसे हालात बन जाते हैं, जहां चंद कंपनियों के एकाधिकार से दाम बेलगाम हो जाते हैं तो खामियाजा ऑटोमोबाइल, साइकिल, इंजीनियरिंग सामान, ऑटो कम्पोनैंट, फैब्रिकेशन, कंस्ट्रक्शन से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर सैक्टर को उठाना पड़ता है। देशभर के 6 करोड़ से अधिक एम.एस.एम.ईज के माली हालात पहले से ही कमजोर हैं। उनमें बड़ी स्टील मिलों से  मोलभाव करने की ताकत नहीं  है और न ही वे बढ़ी हुई इनपुट लागत आम उपभोक्ताओं पर डालने के हालात में हैं। ऐसे मामलों में कई बार सरकारी नीतियों पर सवाल उठते हैं। स्टील इम्पोर्ट पर सेफगार्ड ड्यूटी देश की मुठ्ठीभर स्टील कंपनियों को चीन से सस्ते इम्पोर्ट के झटके से बचने के लिए लगाई गई लेकिन एक आम उपभोक्ता को घरेलू बाजार में बे-लगाम दाम से बचाने का कोई कारगर तरीका नहीं अपनाया गया। 

जवाबदेही जरूरी : स्टील इंपोर्ट पर सेफगार्ड ड्यूटी के साथ घरेलू बाजार में बढ़ते दाम पर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। भारत को एक ऐसे सेफगार्ड ड्यूटी ढांचे की जरूरत है, जिससे घरेलू बाजार में भी कीमतों पर निगरानी रहे। इसका एक बेहतर उपाय है ‘प्राइसट्रिगर मैकेनिज्म’ यानी घरेलू बाजार में स्टील के दाम एक तय सीमा को लंबे समय तक पार कर जाएं तो इंपोर्ट पर सेफगार्ड ड्यूटी हटाई जाए, ताकि घरेलू बाजार में बेतहाशा कीमतों पर लगाम लग सके। यूरोपीय संघ के देशों ने धातुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए ऐसे कई सफल प्रयोग किए हैं। भारत में भी देश की स्टील मिलों व उपभोक्ताओं के हितों में संतुलन की यूरोपियन यूनियन देशों जैसी नीति अपनाई जा सकती है।

आगे की राह : स्टील के दाम में भारी उछाल सिर्फ बढ़ती मांग या अस्थिर कमोडिटी बाजारों की वजह से नहीं, बल्कि अमरीकी डॉलर 96 रुपए के पार जाने से महंगे इम्पोर्ट का फायदा भी स्टील मिलें उठा रही हैं। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए सरकार स्टील इम्पोर्ट पर एक ऐसा सेफगार्ड ड्यूटी सिस्टम लागू करे, जिससे चंद कंपनियों की मनमानी न चले।(लेखक कैबिनेट मंत्री रैंक में पंजाब इकोनॉमिक पॉलिसी एवं प्लानिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन भी हैं)-डा. अमृत सागर मित्तल (वाइस चेयरमैन सोनालीका) 
 

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