पीएमजेडीवाई ने भारत में बैंकिंग को कैसे बदला?

Edited By Updated: 25 Mar, 2025 04:35 PM

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भारत में वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों में। इसकी मुख्य वजहें जटिल दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया, जागरूकता की कमी और न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता थीं। इन बाधाओं को दूर...

नई दिल्लीः भारत में वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों में। इसकी मुख्य वजहें जटिल दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया, जागरूकता की कमी और न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता थीं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार ने 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य सभी नागरिकों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ना था।

यह योजना बिना बैंक खाते वाले व्यक्तियों को बिना किसी न्यूनतम बैलेंस के एक बुनियादी बचत खाता खोलने की अनुमति देती है। जनवरी 2015 तक 12.5 करोड़ से अधिक खाते खोले गए थे और जनवरी 2025 तक यह संख्या बढ़कर 54.5 करोड़ हो गई, जिनमें से 61% खाते महिलाओं के नाम पर हैं। इस योजना ने बचत, ऋण, बीमा, पेंशन और डिजिटल बैंकिंग जैसी सुविधाओं तक सुलभता बढ़ाई है, जिससे आम नागरिकों को किफायती बैंकिंग सेवाएं प्राप्त हो रही हैं।

बैंकिंग सेवाओं में व्यापक विस्तार

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013 में जहां ग्रामीण क्षेत्रों में 68.8% घरों के पास बैंक खाता था, वहीं 2019 तक यह आंकड़ा 97.8% तक पहुंच गया। शहरी क्षेत्रों में भी बैंकिंग सेवाओं की पहुंच 79.5% से बढ़कर 96.9% हो गई। इससे साफ होता है कि 2019 तक भारत में बैंक खाता रखने वाले परिवारों की संख्या लगभग सार्वभौमिक हो गई थी।

अंतर-राज्यीय असमानता घटी

PMJDY का सबसे अधिक लाभ बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और असम जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों को मिला। इन राज्यों में ग्रामीण परिवारों के बैंक खाता रखने की दर में जबरदस्त वृद्धि हुई:

  • बिहार: 55.1% की वृद्धि
  • झारखंड: 47.9% की वृद्धि
  • पश्चिम बंगाल: 43.4% की वृद्धि
  • ओडिशा: 38.4% की वृद्धि
  • छत्तीसगढ़: 38.3% की वृद्धि
  • मध्य प्रदेश: 38% की वृद्धि
  • असम: 37.1% की वृद्धि

शहरी क्षेत्रों में भी इस योजना का व्यापक प्रभाव रहा, और 2019 तक सभी राज्यों में 90% से अधिक शहरी परिवारों के पास बैंक खाते उपलब्ध थे।
 

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