Copper Shortage: न तेल, न कोयला…तांबे की किल्लत से परेशान होगी दुनिया, Economic Survey में दी चेतावनी

Edited By Updated: 29 Jan, 2026 05:51 PM

not oil not coal the world will be troubled by a shortage of copper

देश और दुनिया में बिजली की मांग जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसने एक नए वैश्विक संकट की चेतावनी दे दी है। यह संकट न तो कोयले का है और न ही तेल या टेक्नोलॉजी का, बल्कि कॉपर (तांबा) की संभावित भारी कमी का है। India Economic Survey 2025-26 ने आगाह किया है...

बिजनेस डेस्कः देश और दुनिया में बिजली की मांग जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसने एक नए वैश्विक संकट की चेतावनी दे दी है। यह संकट न तो कोयले का है और न ही तेल या टेक्नोलॉजी का, बल्कि कॉपर (तांबा) की संभावित भारी कमी का है। India Economic Survey 2025-26 ने आगाह किया है कि अगर मौजूदा ट्रेंड जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर कॉपर की सप्लाई गंभीर दबाव में आ सकती है।

आज की डिजिटल और ग्रीन अर्थव्यवस्था में तांबा एक अहम रणनीतिक संसाधन बन चुका है। AI आधारित डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स और पावर ग्रिड अपग्रेड—हर सेक्टर की बुनियाद कॉपर पर टिकी है। यही वजह है कि अब तांबा सिर्फ एक औद्योगिक धातु नहीं, बल्कि एनर्जी ट्रांजिशन का आधार बनता जा रहा है।

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Economic Survey के मुताबिक, बिजली की मांग में उछाल के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला AI डेटा सेंटर्स का तेज़ी से विस्तार, जिनकी ऊर्जा और कूलिंग जरूरतें बेहद ज्यादा हैं। दूसरा, सोलर और विंड एनर्जी जैसे रिन्यूएबल सोर्सेज पर बढ़ती निर्भरता। इन दोनों ही क्षेत्रों में केबल, ट्रांसमिशन लाइन, मोटर, ट्रांसफॉर्मर और ग्रिड नेटवर्क के लिए भारी मात्रा में कॉपर की जरूरत होती है। सर्वे का कहना है कि मौजूदा सप्लाई क्षमता इस बढ़ती मांग के साथ कदम नहीं मिला पाएगी।

कॉपर यील्ड पर भी चिंता

एक रिपोर्ट के अनुसार, Economic Survey में बताया गया है कि सिर्फ 1 गीगावॉट (GW) विंड पावर क्षमता स्थापित करने के लिए लगभग 2,866 टन कॉपर की जरूरत होती है। यह आंकड़ा केवल तांबे का है, इसमें स्टील या कंक्रीट शामिल नहीं हैं। इतना ही नहीं, इस मात्रा के कॉपर को ढोने के लिए करीब 1,194 ट्रकों की जरूरत पड़ेगी। यह दिखाता है कि ग्रीन एनर्जी के पीछे माइनिंग और लॉजिस्टिक्स का दबाव कितना बड़ा है।

सर्वे में यह भी बताया गया है कि कॉपर माइनिंग पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है। मौजूदा माइंस में औसत कॉपर ग्रेड घटकर 0.5–0.6% रह गया है, जबकि नई परियोजनाओं में यह 0.4–0.5% तक गिर चुका है। इसका मतलब है कि 1 टन शुद्ध तांबा निकालने के लिए 167 से 200 टन अयस्क प्रोसेस करना पड़ता है। अगर 0.6% ग्रेड माना जाए, तो सिर्फ 2,866 टन कॉपर के लिए करीब 4.8 लाख टन अयस्क की प्रोसेसिंग करनी होगी।

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यह आंकड़े केवल अयस्क तक सीमित हैं। वेस्ट रॉक, ओवरबर्डन और प्रोसेसिंग लॉस को जोड़ने पर कुल मटेरियल मूवमेंट 2 से 4 गुना तक बढ़ सकता है। यानी 1 GW विंड पावर प्रोजेक्ट के लिए कुल मटेरियल मूवमेंट 10 से 20 लाख टन तक पहुंच सकता है।

भारत और दुनिया के लिए बड़ा संदेश

Economic Survey का साफ कहना है कि अगर कॉपर माइनिंग में निवेश, नई परियोजनाओं की मंजूरी और रीसाइक्लिंग पर समय रहते फोकस नहीं किया गया, तो ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन खुद एक बड़ी बाधा में फंस सकता है। AI, EV, डेटा सेंटर्स और रिन्यूएबल एनर्जी का संयुक्त दबाव तांबे को आने वाले दशक का सबसे रणनीतिक मेटल बना रहा है। अब कॉपर की उपलब्धता ही तय करेगी कि दुनिया का एनर्जी ट्रांजिशन कितनी तेजी से आगे बढ़ पाएगा।

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