Edited By Sarita Thapa,Updated: 12 Apr, 2026 04:03 PM

बैसाखी के पावन पर्व के अवसर पर भारत से सिखों का एक बड़ा जत्था पाकिस्तान पहुंच चुका है। धार्मिक सौहार्द और श्रद्धा के इस मिलन को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।
Baisakhi 2026 : बैसाखी के पावन पर्व के अवसर पर भारत से सिखों का एक बड़ा जत्था पाकिस्तान पहुंच चुका है। धार्मिक सौहार्द और श्रद्धा के इस मिलन को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है। इस वर्ष बैसाखी मनाने के लिए भारत से कुल 2238 सिख श्रद्धालु अटारी-वाघा बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान पहुंचे हैं। पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड के अधिकारियों ने फूलों की वर्षा कर और पारंपरिक तरीके से जत्थे का जोरदार स्वागत किया।
सिख श्रद्धालुओं का 10 दिवसीय यात्रा रूट
गुरुद्वारा श्री पंजा साहिब (हसन अब्दाल): यात्रा का मुख्य पड़ाव हसन अब्दाल है। यहां श्रद्धालु बैसाखी का मुख्य उत्सव मनाएंगे और पवित्र सरोवर में स्नान करेंगे।
गुरुद्वारा जन्मस्थान (ननकाना साहिब): पंजा साहिब के बाद जत्था गुरु नानक देव जी के जन्मस्थान ननकाना साहिब जाएगा। यहां विशेष अरदास और कीर्तन दरबार सजाए जाएंगे।
गुरुद्वारा सच्चा सौदा (फारूकाबाद): ननकाना साहिब के पास स्थित इस ऐतिहासिक स्थान के दर्शन भी जत्थे के रूट में शामिल हैं।
गुरुद्वारा डेरा साहिब (लाहौर): यात्रा का अगला पड़ाव लाहौर होगा, जहां श्रद्धालु गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी स्थान के दर्शन करेंगे।
गुरुद्वारा श्री रोहतास साहिब (झेलम): यह गुरुद्वारा भी सिखों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, जहां जत्था नतमस्तक होगा।
गुरुद्वारा दरबार साहिब (करतारपुर): यात्रा के अंत में श्रद्धालु करतारपुर साहिब जाएंगे, जहाँ गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए थे।
सुरक्षा और सुविधाएं
पाकिस्तान सरकार ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए हैं। यात्रा के दौरान जत्थे के साथ विशेष सुरक्षा दस्ते तैनात रहेंगे। साथ ही, श्रद्धालुओं के ठहरने, लंगर और परिवहन के लिए विशेष बसें और ट्रेनें संचालित की जा रही हैं।
धार्मिक महत्व
बैसाखी का त्योहार सिखों के लिए केवल फसल कटाई का उत्सव नहीं है, बल्कि इसी दिन 1699 में गुरु गोविंद सिंह जी ने 'खालसा पंथ' की स्थापना की थी। पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारों के दर्शन करना हर सिख की दिली तमन्ना होती है, और यह यात्रा उसी आध्यात्मिक जुड़ाव को मजबूत करती है। यह जत्था अपनी 10 दिवसीय तीर्थयात्रा पूरी करने के बाद वापस भारत लौटेगा।
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