Edited By Sarita Thapa,Updated: 03 Apr, 2026 10:16 AM

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होने वाला विश्व प्रसिद्ध 'फूल बंगला' उत्सव इस बार विवादों की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है।
Banke Bihari mandir news : चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होने वाला विश्व प्रसिद्ध 'फूल बंगला' उत्सव इस बार विवादों की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। मंदिर की हाई-पावर मैनेजमेंट कमेटी और सेवायत गोस्वामियों के बीच ठनी रार ने करोड़ों भक्तों को मायूस कर दिया है।
विवाद की असली जड़: 15 हजार बनाम 1.51 लाख
इस साल विवाद का मुख्य कारण फूल बंगला सजाने के लिए तय की गई सहयोग राशि है। मंदिर प्रबंधन समिति ने इस वर्ष फूल बंगला सजाने के लिए रसीद की राशि को सीधे 15,000 रुपये से बढ़ाकर 1.51 लाख रुपये कर दिया है। प्रबंधन का कहना है कि सेवायत भक्तों से लाखों रुपये लेते हैं, जबकि मंदिर कोष में मात्र 15 हजार रुपये जमा होते हैं।
मंदिर के विकास और व्यवस्थाओं के लिए इस राशि को बढ़ाना जरूरी है। सेवायत गोस्वामियों का तर्क है कि यह वृद्धि बहुत अधिक है और सदियों से चली आ रही परंपरा में प्रशासनिक दखलअंदाजी है। उनका कहना है कि इतनी मोटी रकम हर कोई वहन नहीं कर सकता, जिससे यह सेवा केवल अमीरों तक सीमित रह जाएगी।
परंपरा पर पड़ा असर
आमतौर पर 29 मार्च से बांके बिहारी मंदिर में फूल बंगलों का सजना शुरू हो जाता है, जो अगले 137 दिनों तक चलता है। लेकिन इस बार नियमों की सख्ती और फीस वृद्धि के विरोध में कई सेवायतों ने बुकिंग लेने से हाथ खींच लिए हैं। मंदिर का वह आंगन जो फूलों की खुशबू और भव्य सजावट से महकता था, वहां इस बार वह रौनक गायब है।
एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
मंदिर परिसर में इस समय तनाव का माहौल है। जहाँ एक ओर प्रबंधन समिति पारदर्शिता और मंदिर की आय बढ़ाने की बात कर रही है, वहीं सेवायत इसे अपने धार्मिक अधिकारों का हनन बता रहे हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर "ठीकरा फोड़" रहे हैं:
सेवायत: "समिति के तानाशाही रवैये के कारण उत्सव की गरिमा खत्म हो रही है।"
समिति: "सेवायत पारदर्शिता नहीं चाहते और निजी स्वार्थ के लिए परंपरा को रोक रहे हैं।"
भक्तों की बढ़ी मायूसी
दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु, जो भीषण गर्मी में ठाकुर जी को फूलों के शीतल बंगले में विराजमान देखने आते हैं, वे इस खींचतान से सबसे ज्यादा दुखी हैं। वृंदावन आने वाले पर्यटकों की संख्या पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है।
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