Basant Panchami 2026 : आखिर क्यों बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की दरगाह पर चढ़ती है पीली चादर ? जानें रहस्यमयी परंपरा

Edited By Updated: 23 Jan, 2026 04:53 PM

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Basant Panchami 2026 : आज माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है और इसी अवसर पर पूरे देश में बसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन दो कारणों से विशेष महत्व रखता है एक तो विद्या की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस और दूसरा बसंत ऋतु का आगमन।

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Basant Panchami 2026 : आज माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है और इसी अवसर पर पूरे देश में बसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन दो कारणों से विशेष महत्व रखता है एक तो विद्या की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस और दूसरा बसंत ऋतु का आगमन। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि को मां सरस्वती प्रकट हुई थीं, इसलिए इस दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और व्रत रखने की परंपरा भी है।

बसंत पंचमी को हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र पर्व माना जाता है। इस दिन विद्यालयों, गुरुकुलों और शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थी और शिक्षक मिलकर सरस्वती पूजा करते हैं। हालांकि यह पर्व केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली में एक ऐसी दरगाह भी है, जहां इस दिन पीले फूल और पीली चादर चढ़ाने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है।

दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर भी बसंत पंचमी का उत्सव बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। यह पर्व हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच सांस्कृतिक एकता और आपसी सौहार्द का प्रतीक बन चुका है। इस अवसर पर दूर-दूर से लोग दरगाह पर पहुंचते हैं और मजार पर पीले रंग के फूल अर्पित करते हैं। पूरे परिसर को पीली चादरों और गेंदे के फूलों से सजाया जाता है।

दरगाह पर पीली चादर चढ़ाने की परंपरा अपने आप में विशेष मानी जाती है, क्योंकि सामान्यतः दरगाहों में हरे रंग की चादर अर्पित की जाती है। लेकिन बसंत पंचमी को पीला रंग उल्लास, ऊर्जा और नई ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा लगभग 700 से 800 वर्ष पुरानी है।

इस अनोखी परंपरा की शुरुआत से जुड़ी एक रोचक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया निसंतान थे और वे अपने भांजे तकिउद्दीन को पुत्र समान मानते थे। दुर्भाग्यवश उनके निधन के बाद औलिया गहरे शोक में डूब गए। उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो यह देखकर चिंतित हो उठे।

एक दिन अमीर खुसरो ने कुछ महिलाओं को पीले वस्त्र पहनकर, सरसों के फूलों के साथ नृत्य करते और गीत गाते देखा। महिलाओं ने बताया कि पीले रंग के वस्त्र और फूल चढ़ाने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। इसके बाद अमीर खुसरो पीले फूल लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के पास पहुंचे और गीत-संगीत के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास किया। यह दृश्य देखकर औलिया के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।

तभी से बसंत पंचमी के अवसर पर हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में पीली चादर चढ़ाने और पीले फूल सजाने की परंपरा चली आ रही है, जो आज भी आपसी प्रेम, सांस्कृतिक एकता और सद्भाव का संदेश देती है।

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