कैसे हुई श्री राम भक्त जटायु को मुक्ति, जानने के लिए पढ़ें ये कथा

Edited By Jyoti,Updated: 01 Dec, 2022 01:21 PM

dharmik katha of sri ram and jatayu

प्रजापति कश्यप जी की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए गरुड़ और अरुण। अरुण जी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।

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प्रजापति कश्यप जी की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए गरुड़ और अरुण। अरुण जी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य मंडल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लम्बी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु तो बीच से लौट आए परन्तु सम्पाती उड़ते ही चले गए। सूर्य के निकट पहुंचने पर सूर्य के प्रखर ताप से सम्पाती के पंख जल गए और वह समुद्र तट पर गिर कर चेतना शून्य हो गए। चंद्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता युग में श्री सीता जी की खोज करने वाले बंदरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया।
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जटायु पंचवटी में आकर रहने लगे। एक दिन शिकार के समय महाराज दशरथ से इनका परिचय हुआ और यह महाराज दशरथ के अभिन्न मित्र बन गए। वनवास के समय जब भगवान श्री राम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे, तब जटायु से उनका परिचय हुआ। भगवान श्री राम अपने पिता के मित्र जटायु का सम्मान अपने पिता के समान ही करते थे।

भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता जी के कहने पर कपट मृग मारीच को मारने के लिए गए और लक्ष्मण भी सीता जी के कटुवाक्य से प्रभावित होकर श्री राम को खोजने के लिए निकल पड़े। आश्रम को सूना देख कर रावण ने सीता जी का हरण कर लिया और बलपूर्वक उन्हें रथ में बैठा कर आकाश मार्ग से लंका की ओर ले चला।

सीता जी का करुण विलाप सुनकर जटायु ने रावण को ललकारा। जटायु का रावण से भयंकर संग्राम हुआ और अंत में रावण ने तलवार से उनके पंख काट डाले।जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़े और सीता जी को लेकर रावण लंका की ओर चला गया। सीता जी को खोजते हुए भगवान श्री राम की दृष्टिï घायल जटायु पर पड़ी।
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जटायु मरणासन्न थे। वह श्री राम के चरणों का ध्यान करते हुए उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे थे। इन्होंने श्री राम से कहा, ‘‘राक्षसराज रावण ने मेरी यह दशा की है। वह सीता जी को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया है। मैंने आपके दर्शनों के लिए ही अब तक अपने प्राणों को रोक रखा था। अब मुझे अंतिम विदा दें।’’

भगवान श्री राम के नेत्र भर आए। उन्होंने जटायु से कहा, ‘‘तात! मैं आपके शरीर को अजर-अमर तथा स्वस्थ कर देता हूं, आप अभी संसार में रहें।’’
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जटायु बोले, ‘‘श्री राम! मृत्यु के समय आपका नाम मुख से उच्चरित हो जाने पर अधम प्राणी भी भव बंधन से मुक्त हो जाता है। आज तो साक्षात आप स्वयं मेरे पास हैं। अब मेरे जीवित रहने से कोई लाभ नहीं है।’’

भगवान श्री राम ने पक्षीराज जटायु के शरीर को अपनी गोद में रख लिया। उन्होंने के शरीर की धूल को अपनी जटाओं से साफ किया। जटायु ने उनके मुख कमल का दर्शन करते हुए उनकी गोद में अपना शरीर छोड़ दिया। इन्होंने परोपकार के बल पर भगवान का आश्रय प्राप्त किया और भगवान ने इनकी अन्त्येष्टि क्रिया को अपने हाथों से सम्पन्न किया। पक्षीराज जटायु के सौभाग्य की महिमा का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

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