Gupt Navratri: साल में 4 नवरात्रि क्यों होती हैं? जानें माघ व आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि का रहस्य, साधना और चमत्कारी उपाय

Edited By Updated: 26 Jan, 2026 02:29 PM

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Gupt Navratri: हिंदू धर्म के अनुसार, एक वर्ष में चार नवरात्रि होती हैं, लेकिन आमजन केवल दो नवरात्रि (चैत्र व शारदीय नवरात्रि) के बारे में ही जानते हैं। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती...

Gupt Navratri: हिंदू धर्म के अनुसार, एक वर्ष में चार नवरात्रि होती हैं, लेकिन आमजन केवल दो नवरात्रि (चैत्र व शारदीय नवरात्रि) के बारे में ही जानते हैं। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में भी गुप्त नवरात्रि मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

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आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। आषाढ़ व माघ मास की नवरात्रियों में काफी भिन्नताएं हैं। आषाढ़ मास की नवरात्रि में जहां वामाचार उपासना की जाती है, वहीं माघ मास की नवरात्रि में वामाचार पद्धति को अधिक मान्यता नहीं दी गई है।

ग्रंथों के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष का विशेष महत्व है। शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं। इन्हीं कारणों से माघ मास की नवरात्रि में सनातन, वैदिक रीति के अनुसार, देवी साधना करने का विधान निश्चित किया गया है। 

आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि का समय शाक्य एवं शैव धर्मावलंबियों के लिए पैशाचिक, वामाचारी क्रियाओं के लिए अधिक शुभ एवं उपयुक्त होता है। इसमें प्रलय एवं संहार के देवता महाकाल एवं महाकाली की पूजा की जाती है।  इन्हीं संहारकर्ता देवी-देवताओं के गणों एवं गणिकाओं अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच, बैताल, डाकिनी, शाकिनी, खण्डगी, शूलनी, शववाहनी आदि की साधना की जाती है।

ऐसी साधनाएं शाक्त मतानुसार शीघ्र ही सफल होती हैं। दक्षिणी साधना, योगिनी साधना, भैरवी साधना के साथ पंचमकार की साधना इसी नवरात्रि में की जाती है।

दुनिया में केवल चार श्मशानघाट ही ऐसे हैं, जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है- ये हैं तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) का श्मशान, त्रयंबकेश्वर (नासिक) और उज्जैन स्थित चक्रतीर्थ श्मशान। गुप्त नवरात्रि में यहां दूर-दूर से साधक गुप्त साधनाएं करने आते हैं। आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं।

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शास्त्रों के अनुसार, प्रतिपदा से लेकर नौ तिथियों में देवी को विशिष्ट भोग अर्पित करने तथा ये भोग गरीबों को दान करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। ये उपाय बहुत ही आसान हैं।

यदि ये उपाय पूरी श्रृद्धा व विश्वास से किए जाएं तो किस्मत भी साथ देने लगती है। गुप्त नवरात्रि में हर दिन देवी के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है।

इन नौ दिनों में विविध प्रकार की पूजा से माता को प्रसन्न किया जाता है। गुप्त नवरात्रि में देवी को विभिन्न प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। प्रतिपदा यानी गुप्त नवरात्रि के पहले दिन माता को घी का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा वह निरोगी होता है।

गुप्त नवरात्रि की द्वितीया तिथि को माता को शक्कर का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे साधक को दीर्घायु प्राप्त होती है। तृतीया तिथि को माता को दूध चढ़ाएं तथा इसका दान करें। ऐसा करने से सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है। चतुर्थी तिथि को मालपूआ चढ़ा कर दान करें। इससे सभी प्रकार की समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं।

पंचमी को केले तथा षष्ठी तिथि को शहद का भोग लगाएं। केले का भोग लगाने से परिवार में सुख-शांति रहती है, वहीं शहद चढ़ाने से धन संबंधी समस्याओं का निराकरण होता है। भोग लगाने के बाद इन दोनों वस्तुओं को गरीबों में बांट दें। गुप्त नवरात्र में षष्ठी, सप्तमी और अष्टमी का त्रिदिवसीय शुभ योग होता है जब कुमार षष्ठी, विवस्वत सप्तमी और दुर्गाष्टमी का व्रत रखा जाएगा।


कुमार षष्ठी व्रत हेतु भगवान शालिग्रामजी का विग्रह, कार्तिकेय का चित्र, तुलसी का पौधा (गमले में लगा हुआ), तांबे का लोटा, नारियल, पूजा की सामग्री, जैसे- कुमकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन, अबीर, गुलाल, दीपक, घी, इत्र, पुष्प, दूध, जल, मौसमी फल, मेवा, मौली, आसन इत्यादि आवश्यक हैं। विवस्वत सप्तमी के दिन मध्याह्न में विवस्वत सूर्य पूजा का विधान है। इस दिन रथ चक्र के जैसा गोल मंडल बनाकर इस का गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पण कर, पंचोपचार पूजा करें व दान दें।

महाष्टमी के दिन हल्दी के जल से स्नान करने के बाद वैसे ही जल से महिषंधी देवी को स्नान कराएं एवं केसर, चंदन, धूप, कपूर आदि से षोडशोपचार पूजन करें। गुप्त नवरात्र में दुर्गाष्टमी का विशेष महत्व है।  

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