Edited By Sarita Thapa,Updated: 29 Jul, 2026 03:42 PM
योग को समझने के लिए लम्बी-चौड़ी परिभाषाएं या किसी विचार-विमर्श की आवश्यकता नहीं हैI 'योग' तो केवल 'गुरु' के साथ आपका अपना सम्बन्ध है, गुरु-शिष्य के बीच एक ऐसा अटूट सम्बन्ध जो गुरु के चरणों से शुरू होकर वहीं समाप्त होता है और गुरु बनाना या धारण करना...
Guru Purnima Night Significance : योग को समझने के लिए लम्बी-चौड़ी परिभाषाएं या किसी विचार-विमर्श की आवश्यकता नहीं हैI 'योग' तो केवल 'गुरु' के साथ आपका अपना सम्बन्ध है, गुरु-शिष्य के बीच एक ऐसा अटूट सम्बन्ध जो गुरु के चरणों से शुरू होकर वहीं समाप्त होता है और गुरु बनाना या धारण करना भी एक साधना है I इस लेख में हम, एक शिष्य के दृष्टिकोण से 'गुरु-शिष्य' के सम्बन्ध को थोड़ा और गहराई से समझने की कोशिश करेंगे I

ध्यान मूलम् गुरु मूर्ति, पूजा मूलम् गुरु पदम् I
मंत्र मूलम् गुरु वाक्यं, मोक्ष मूलम् गुरु कृपा I
उर्पयुक्त श्लोक एक शिष्य के जीवन का सार है, अर्थात गुरु की छवि ही शिष्य के ध्यान का केंद्र है तथा सारे तीर्थ गुरु के चरणों में ही हो जाते हैं I गुरु का प्रत्येक शब्द शिष्य के लिए एक मंत्र है (संहिताबद्ध ऊर्जा) और वह केवल गुरु कृपा से ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है Iशास्त्रों में 'गुरु' को सर्वोच्च स्थान दिया गया है I 'गुरु' ही 'ब्रह्मा','विष्णु' और 'शिव' हैं हालांकि भगवान ब्रह्मा की तरह उनके चार सिर, भगवान विष्णु की तरह चार भुजाएं तथा भगवान शिव की तरह तीन नेत्र नहीं हैं, किन्तु अकेले गुरु तत्व के अनुभव में ही,एक शिष्य, परब्रह्मा या उस अव्यक्त शक्ति का अनुभव कर लेता है I ऐसी गुरु की महिमा और महत्व है कि 'रुद्रयामला' में यह कहा गया है कि 'एक गुरु के प्रति समर्पण द्वारा एक जीव को, देवों के राजा इन्द्र का राज्य प्राप्त होगा लेकिन अकेले मेरे प्रति (इष्ट देवता ) समर्पण द्वारा वह मुझे प्राप्त नहीं हो सकता ' I
एक शिष्य के लिए गुरु से जुड़ा हुआ सब कुछ सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोपरि है I ऐसा कहा जाता है कि जिस जगह गुरु रहते हैं वह स्थान शिष्य के लिए कैलाश है, वहां के वृक्ष कल्प-वृक्ष हैं, वहां पर बहता पानी गंगा है, वहां पर उगने वाली जड़ी-बूटियां संजीवनी बूटी हैं, वहां की हवा प्राण वायु है, वहां परोसा गया भोजन परमात्मा का प्रसाद है तथा जल अमृत I जब एक शिष्य गुरु के साथ ध्यान के लिए बैठता है, उतना समय उसके लिए वहीं रुक जाता है, क्योंकि उस समय के रूप में वह गुरु की अवस्था का अनुभव कर रहा होता है, तथा गुरु द्वारा की गयी वर्षों की साधना के अनुभवों की भी अनुभूति कर लेता है I जन्म-जन्मान्तर से की जा रही साधना के बाद ही एक जीव अपने गुरु से मिलता है और जब ऐसा होता है इसके कुछ संकेत होते हैं I
पहला संकेत यह होता है कि आपके शरीर में कुछ विशेष परिवर्तन होने लगते हैं, वह वैसा ही दिखना शुरू हो जाता है जैसा आप चाहते थे I दूसरा, शरीर में किसी भी प्रकार का रोग या असंतुलन गायब हो जाता है और आप बीमार होना बंद हो जाते हो I तीसरा संकेत है कि आप उन शक्तियों का अनुभव करने लगते हैं जो इस सृष्टि को चलाती हैं I एक गुरु आपको आपकी समस्याओं से छुटकारा दिलाने का न तो कोई दावा करते हैं और न ही आपसे कोई शुल्क लेते हैं बल्कि वह तो शिष्य को परम सत्य की और ले जाने वाले उस मार्ग पर डालते हैं जहां से सूक्ष्म लोकों के द्वार खुलते हैं I गुरु अष्टांग योग के पांच यमों में स्थिर होते हैं I वह योग के तेज और आकर्षण से ओत-प्रोत होते हैं, वह जो कुछ भी कहते हैं वह अवश्य होता है अर्थात उनमे वाक्-शक्ति होती है, उनका मंत्र उच्चारण जादुई सा होता है जो दैविक अनुभव व् अभिव्यक्तियाँ प्रदान करता है और जिसे ध्यान आश्रम के साधक प्रतिदिन अनुभव करते हैंI

गुरु बनाने में कभी भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए बल्कि, स्वयं के अनुभवों पर आधारित विश्वास करके ही, पूर्ण रूप से सुनिचित होकर ही गुरु बनाने चाहियें I योग सूत्रों ने, एक गुरु बनाने से पहले, शिष्य को सभी कुछ समझने, निरिक्षण व् विश्लेषण करने के लिए दो वर्ष का समय दिया है I यदि एक बार आपने गुरु बना लिए और उसके बाद उन पर संदेह किया या अपना मार्ग बदला तो यह उनके प्रति अनादर होता है जिसे गुरु-द्रोह माना जाता है तथा उस कारण वर्षों की साधना बेकार हो जाती है I शिष्य द्वारा गुरु बनाये जाने के पश्चात् अगले दो वर्ष, गुरु, साधक को शिष्य के रूप में स्वीकार करने का समय लेते हैं I
जिस प्रकार गुरु मिलने दुर्लभ हैं, उसी प्रकार शिष्य भी संख्या में कम हैं I गुरु की भांति शिष्य को पहचानने के लिए भी कुछ संकेतक हैं I एक शिष्य का हर पल अपने गुरु पर ही ध्यान केंद्रित रहता है, उसके लिए और किसी भी का भी अस्तित्व नहीं रहता I गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण व् विश्वास ही उसकी पहचान होती है अन्यथा मार्ग से हटाने के लिए एक संदेह ही काफी होता है I गुरु और शिष्य के बीच कोई पर्दा नहीं होता I एक शिष्य अपने गुरु की ही छवि होता है, उसकी वृत्ति गुरु की अवस्था पर निर्भर होती है तथा वह अपने गुरु का तेज और आकर्षण स्कन्दित करता है I
एक बार जब गुरु ने किसी को अपना शिष्य बना लिया तो वह पूर्ण रूप से उसका उत्तरदायित्व ले लेते हैं और न केवल दिन-प्रतिदिन बल्कि हर पल उसका ध्यान रखते हैं तथा निःसंदेह उसे योग के मार्ग पर संभाले रहते हैं I जबकि गुरु का दायित्व शिष्य को ज्ञान प्रदान करना है, वहीँ शिष्य का दायित्व गुरु सेवा है I गुरु - शिष्य सम्बन्ध की ऐसी महिमा है जिसमे किसी भी प्रकार के धन-सम्बन्धी, जिस्मानी या और कोई भी भौतिक लें - दें की कोई गुंजाईश नहीं है I अगर दोनों के बीच इस प्रकार का कोई भी आदान-प्रदान है तो विश्वास मानिए वह एक तमाशा है, व्यापार है न कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध I
एक शिष्य के लिए गुरु - पूर्णिमा की रात का विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन के रूप में गुरु - शक्ति अपने चरम पर होती है तथा जो भी शिष्य अपने गुरु में स्थिर है, वह इसे सरलता से पा लेता है I गुरु के सानिध्य में,इस रात को की गयी मंत्र साधना व् यज्ञ, साधक को वर्षों की गयी साधना व् तप के फल समान लाभ प्रदान करती है I योग दर्शन में गुरु पूर्णिमा का स्थान सर्वोच्च है, क्योंकि यह वह दिन है जब गुरु की शक्ति अपने चरम पर होती है और अति सुगमता से उपलब्ध होती है।

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