Edited By Sarita Thapa,Updated: 17 Jan, 2026 04:19 PM

महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह कर्म, नियति और धर्म की जटिलताओं का एक जीवंत दस्तावेज है। इस महागाथा में दानवीर कर्ण का चरित्र सबसे अधिक विस्मयकारी और भावुक कर देने वाला है।
Mahabharat Katha : महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह कर्म, नियति और धर्म की जटिलताओं का एक जीवंत दस्तावेज है। इस महागाथा में दानवीर कर्ण का चरित्र सबसे अधिक विस्मयकारी और भावुक कर देने वाला है। एक ऐसा योद्धा जिसके पास न केवल दिव्य अस्त्र थे, बल्कि उसके अक्षय पुण्यों का भंडार भी था। लेकिन इतिहास की इस विडंबना को देखिए कर्ण की जिस दानवीरता और पुण्य की चर्चा आज युगों बाद भी की जाती है, वही उनकी मृत्यु और हार का सबसे बड़ा कारण बनी। अक्सर हम मानते हैं कि हमारे द्वारा किए गए सत्कर्म हमारी रक्षा करते हैं, लेकिन कर्ण के मामले में स्वयं भगवान कृष्ण को एक ऐसी कूटनीति रचनी पड़ी जहां उनके संचित पुण्यों को ही उनके विरुद्ध इस्तेमाल किया गया। जब तक कर्ण के पास उनके जीवन भर की दानवीरता का फल था, तब तक मृत्यु का कोई भी बाण उनका स्पर्श नहीं कर सकता था। तो आइए जानते हैं आखिर क्यों एक महान दानी को उसके अपने ही धर्म की सजा मिली और वह कौन सा अंतिम दान था जिसने कुरुक्षेत्र के युद्ध का परिणाम तय कर दिया।
कवच और कुंडल का दान: सुरक्षा की पहली चूक
कर्ण की शक्ति का सबसे बड़ा आधार उनके जन्मजात कवच और कुंडल थे, जो उन्हें अजेय बनाते थे। देवराज इंद्र जानते थे कि जब तक कर्ण के पास यह सुरक्षा कवच है, अर्जुन उन्हें पराजित नहीं कर सकते। इंद्र ने एक ब्राह्मण का भेष धरकर कर्ण की दानवीरता की परीक्षा ली। कर्ण यह जानते हुए भी कि सामने स्वयं देवराज इंद्र हैं, अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे और अपना सुरक्षा कवच दान कर दिया। यहीं से उनकी हार की पहली पटकथा लिखी गई।

अंतिम क्षणों में भी दान का धर्म
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कर्ण असहाय स्थिति में मृत्युशैया पर थे, तब भगवान कृष्ण ने उनकी दानवीरता की अंतिम परीक्षा लेने का निर्णय लिया। एक गरीब ब्राह्मण बनकर कृष्ण ने कर्ण से दान माँगा। कर्ण के पास उस समय देने के लिए कुछ नहीं था, सिवाय उनके सोने के दांत के। उन्होंने पत्थर से अपना दांत तोड़कर ब्राह्मण को अर्पित कर दिया।
जब पुण्य ही बन गए बाधा
कहा जाता है कि कर्ण के जीवन भर के पुण्यों का सुरक्षा घेरा इतना मजबूत था कि स्वयं यमराज भी उनके प्राण लेने में हिचकिचा रहे थे। जब तक कर्ण के पुण्य उनके साथ थे, अर्जुन का कोई भी बाण उनका वध नहीं कर पा रहा था। तब भगवान कृष्ण ने एक कूटनीति के तहत कर्ण को प्रेरित किया कि वे अपने समस्त पुण्यों का फल उस गरीब ब्राह्मण को दान कर दें। जैसे ही कर्ण ने अपने जीवनभर की तपस्या और दान का फल ब्राह्मण को सौंपा, उनके ऊपर से 'दैवीय सुरक्षा चक्र' हट गया। इसी क्षण का लाभ उठाकर अर्जुन ने अंजलिका अस्त्र का प्रयोग किया और कर्ण वीरगति को प्राप्त हुए।

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