Niyog Tradition : क्या थी नियोग प्रथा की सच्चाई और क्यों मनु ने इसे बताया खराब ?

Edited By Updated: 02 Mar, 2026 02:48 PM

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Niyog Tradition : महाभारत काल में नियोग प्रथा एक स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था मानी जाती थी। उस समय यदि किसी पुरुष से संतान उत्पन्न नहीं हो पाती थी या किसी स्त्री के पति का निधन हो जाता था, तो परिवार की अनुमति से वह किसी योग्य पुरुष से केवल संतान...

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Niyog Tradition : महाभारत काल में नियोग प्रथा एक स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था मानी जाती थी। उस समय यदि किसी पुरुष से संतान उत्पन्न नहीं हो पाती थी या किसी स्त्री के पति का निधन हो जाता था, तो परिवार की अनुमति से वह किसी योग्य पुरुष से केवल संतान प्राप्ति के उद्देश्य से संबंध स्थापित कर सकती थी। यह संबंध स्थायी नहीं होता था। संतान के जन्म के बाद दोनों के बीच का यह संबंध स्वतः समाप्त हो जाता था। इस प्रथा के स्पष्ट नियम थे, ताकि सामाजिक मर्यादा और शुचिता बनी रहे।

समय के साथ समाज के नैतिक मानदंड बदलने लगे। महाभारत काल के अंतिम चरण तक आते-आते इस व्यवस्था का दुरुपयोग होने लगा। लोगों ने इसे आवश्यकता के बजाय निजी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बनाना शुरू कर दिया। इससे सामाजिक संतुलन और पारिवारिक संरचना पर खतरा उत्पन्न होने लगा।

इसी पृष्ठभूमि में ऋषि मनु ने नियोग प्रथा का कड़ा विरोध किया। प्रारंभिक ग्रंथों में कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी अनुमति का उल्लेख मिलता है, लेकिन बाद में उन्होंने इसे पूर्ण रूप से अनुचित घोषित कर दिया। उन्होंने इसे ‘पशुधर्म’ कहकर इसकी आलोचना की। उनका मत था कि विवाह के बाद स्त्री और पुरुष दोनों को एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए। विधवा स्त्रियों के लिए उन्होंने संयम और ब्रह्मचर्य को आदर्श मार्ग बताया।

मनु का तर्क था कि यदि नियोग को सामान्य सामाजिक व्यवहार का रूप दे दिया जाए तो इससे मर्यादा भंग हो सकती है और धर्म के नाम पर अनैतिकता बढ़ सकती है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए थी, न कि समाज की स्थायी परंपरा के रूप में।

नियोग प्रथा का स्वरूप कुछ हद तक उन परंपराओं से मिलता-जुलता था जिन्हें समाजशास्त्र में ‘लेविरेट विवाह’ कहा जाता है। इसमें पति की मृत्यु के बाद पत्नी का विवाह या संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से संबंध पति के भाई से कराया जाता था।

ऋषि मनु, जिन्हें मनुस्मृति का रचयिता माना जाता है, ने स्पष्ट रूप से कहा कि वंश वृद्धि के नाम पर विवाह की पवित्रता को भंग करना उचित नहीं है। उनके कठोर रुख के बाद उत्तर-वैदिक काल में नियोग प्रथा धीरे-धीरे समाज से लगभग समाप्त हो गई।

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