Edited By Sarita Thapa,Updated: 16 Feb, 2026 01:33 PM

ब्रज की माटी में जब फाल्गुन की बयार बहती है, तो कण-कण राधे-कृष्ण के प्रेम रंग में रंग जाता है। इसी पावन मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाता है, जो इस वर्ष 19 फरवरी 2026 को है।
Phoolera Dooj 2026 : ब्रज की माटी में जब फाल्गुन की बयार बहती है, तो कण-कण राधे-कृष्ण के प्रेम रंग में रंग जाता है। इसी पावन मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाता है, जो इस वर्ष 19 फरवरी 2026 को है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि प्रेम की वह पराकाष्ठा है जहां रंगों से पहले खुशबूदार फूलों से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। अक्सर लोग इसे अबूझ मुहूर्त या विवाह के सबसे शुभ दिन के रूप में जानते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा हृदय को छू लेने वाली है। तो आइए जानते हैं क्यों फुलेरा दूज के दिन फूलों से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई।
क्यों खेली गई थी पहली फूलों वाली होली ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय भगवान श्री कृष्ण अपनी व्यस्तताओं के कारण लंबे समय तक राधा रानी से मिलने वृंदावन नहीं जा पाए थे। कृष्ण के वियोग में राधा रानी अत्यंत उदास रहने लगीं। उनकी उदासी का प्रभाव पूरे ब्रज की प्रकृति पर पड़ने लगा। फूल मुरझा गए, पत्तियां सूखने लगीं और प्रकृति की हरियाली लुप्त होने लगी। जब श्री कृष्ण को इस बात का आभास हुआ, तो वे तुरंत राधा जी से मिलने पहुंचे। राधा रानी को सामने पाकर कृष्ण ने पास ही खिले एक फूल को तोड़कर उन पर फेंक दिया। जवाब में राधा जी ने भी कृष्ण पर फूल फेंके। देखते ही देखते वहां मौजूद गोप-ग्वालों ने भी एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा शुरू कर दी। कहते हैं कि उस दिन समूचे ब्रज में फूलों की इतनी वर्षा हुई कि सूखी हुई प्रकृति फिर से खिल उठी। तभी से फाल्गुन की इस द्वितीया को 'फुलेरा दूज' कहा जाने लगा और फूलों की होली की परंपरा शुरू हुई।

फुलेरा दूज का आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
साक्षात अबूझ मुहूर्त
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार, फुलेरा दूज का पूरा दिन 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है। इसका अर्थ है कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचांग देखने या किसी ज्योतिषी से मुहूर्त पूछने की आवश्यकता नहीं होती। यह दिन स्वयं में ही अत्यंत शुद्ध और दोषमुक्त है।
प्रेम और वैवाहिक सुख का वरदान
जो लोग वैवाहिक जीवन में तनाव का सामना कर रहे हैं या जिनके विवाह में देरी हो रही है, उनके लिए यह दिन वरदान समान है। इस दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त पूजा करने से प्रेम संबंधों में मधुरता आती है।
वसंत ऋतु का पूर्ण प्रभाव
यह दिन शीत ऋतु के जाने और वसंत के पूर्ण रूप से छा जाने का प्रतीक है। आयुर्वेद के नजरिए से भी यह समय मन को प्रसन्न करने वाला और स्वास्थ्यवर्धक माना गया है।

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