समुद्र मंथन का वो अनसुना सच: देवभूमि के इस मंदिर में महादेव संग विराजते हैं असुर राहु, दर्शन मात्र से कटते हैं ग्रहों के दोष!

Edited By Updated: 02 Jun, 2026 01:05 PM

rahu shiva temple pauri garhwal

Rahu Shiva Temple Pauri Garhwal: जानें उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित पैठानी के राहु मंदिर का रहस्य। यहां समुद्र मंथन के बाद राहु का सिर गिरा था। राहु दोष से मुक्ति के लिए यहां होती है महादेव और असुर राहु की अनोखी पूजा।

Rahu Shiva Temple Pauri Garhwal: भारत अपनी प्राचीन मान्यताओं और रहस्यमयी मंदिरों के लिए दुनिया भर में विख्यात है। अक्सर मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के पैठानी गांव में एक ऐसा अनोखा मंदिर स्थित है, जो परंपराओं से बिल्कुल अलग है। यहां महादेव के साथ किसी देवता की नहीं, बल्कि एक असुर की पूजा की जाती है। इसे राहु मंदिर के नाम से जाना जाता है, जहां भगवान शिव और राहु एक साथ एक ही श्रद्धा के साथ पूजे जाते हैं।

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समुद्र मंथन से जुड़ी है इस मंदिर की कथा
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित पैठानी का राहु मंदिर एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां शिवलिंग के रूप में शिव जी को नहीं बल्कि छाया ग्रह राहु देवता को पूजा जाता है। समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है इस मंदिर का इतिहास। जब श्री हरि मोहिनी रुप में सभी देवों को अमृत पिला रहे थे तो राहु ने छल से अमृत का सेवन कर लिया। उसे अमरता का वरदान प्राप्त न हो इसलिए भगवान विष्णु ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। राहु का कटा हुआ सिर उत्तराखंड के इसी स्थान पर गिरा। जहां सिर गिरा उसी स्थान पर एक मंदिर का निर्माण किया गया। ऐसा माना जाता है कि आज भी राहु का सिर यहां इस पत्थर के नीचे फंसा हुआ है।

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राहु दोष और ग्रहों की पीड़ा से मिलती है मुक्ति
स्कंद पुराण के केदार खंड में भी इस मंदिर का वर्णन मिलता है। इसमें बताई गई कथा के अनुसार महाभारत के बाद जब पांडव स्वर्गारोहिणी की ओर जा रहे थे तो उन पर राहु दोष लग गया था। जिसके बाद पांडवों के द्वारा राहु दोष से मुक्ति पाने के लिए राहु की पूजा की गई थी। ये उत्तर भारत का एकमात्र राहु मंदिर है जिसका निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य के द्वारा किया गया था और जिस शैली में केदारनाथ मंदिर बनाया गया है। उसी शैली में ये राहु मंदिर भी बनाया गया है।

ऐसा भी माना जाता है कि यहां शिव के दर्शन करने से राहु दोष से मुक्ति मिल जाती है। सावन के महीने में इस मंदिर में बैल दान   करना कष्टों से मुक्ति का मार्ग बताया जाता है।

धड़ विहीन राहू की मूर्ति वाला ये मंदिर देखने में बहुत प्राचीन प्रतीत होता है। इसकी प्राचीन शिल्पकला अनोखी और आकर्षक है। पश्चिममुखी इस प्राचीन मंदिर के बारे में यहां के लोगों का मानना है कि राहू की दशा की शान्ति और भगवान शिव की आराधना के लिए ये मंदिर पूरी दुनिया में सबसे उपयुक्त स्थान है। पश्चिम की ओर मुख वाले इस प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्राचीन शिवलिंग है। मंदिर के शीर्ष पर अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक रूप में गज व सिंह की स्थापना की गई है। मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर स्थित मंदिरों के शिखर क्षितिज पट्टियों से सज्जित हैं।

मंदिर की दीवारों के पत्थरों पर आकर्षक नक्काशी की गई है, जिनमें राहु के कटे हुए सिर व सुदर्शन चक्र उत्कीर्ण हैं। इस मंदिर के बाहर हाथी और शेर की प्रतिमा है जो बहुत ही पुरानी और अनोखी है। इसी कारण मंदिर को राहु मंदिर नाम दिया गया।

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