Dharmik Katha: जब इंद्र देव ने लगाई बादलों की क्लास

Edited By Jyoti,Updated: 13 Jul, 2022 05:22 PM

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भगवान इन्द्र ने मौसम विभाग की बैठक बुलाई। बैठक में बादलों को भी बुलाया गया। मौसम विभाग के कर्मचारियों से उनके कार्यों की प्रगति रिपोर्ट मांगी। सबके कार्यों की समीक्षा हुई। बादलों की प्रगति रिपोर्ट से वह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बादलों को फटकार...

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भगवान इन्द्र ने मौसम विभाग की बैठक बुलाई। बैठक में बादलों को भी बुलाया गया। मौसम विभाग के कर्मचारियों से उनके कार्यों की प्रगति रिपोर्ट मांगी। सबके कार्यों की समीक्षा हुई। बादलों की प्रगति रिपोर्ट से वह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बादलों को फटकार लगाई, ‘‘कहां भटकते रहते हो। लोग बरसात के लिए तरस रहे हैं और तुम सैर-सपाटा करते फिरते हो।’’

उन्होंने बादलों को निर्देश दिए, ‘‘सावन नजदीक आ रहा है। पृथ्वी पर आपको जल अर्पित करना है। सभी अपनी-अपनी तैयारी कर लें। आपको सभी जगह पर समान रूप से बरसात करनी है। किसी भी बादल का यह बहाना नहीं चलेगा कि मेरी टंकी टूट गई थी, मेरी टंकी लीक हो गई थी या पानी रास्ते में ही बिखर गया था।’’
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‘‘कुछ बादल हरियाली को देखकर लालच में आ जाते हैं। चेरापूंजी जैसी बारिश वे मुंबई में ही बरसा कर लौट आते हैं। इससे रेगिस्तान तो सूखा ही रह जाता है और अफरा-तफरी मच जाती है। राजस्थान से प्रार्थनाएं आ रही हैं। लोग पुकार रहे हैं। बरसात के लिए यज्ञ कर रहे हैं। हवन कर रहे हैं, मीठे चावल बांट रहे हैं।’’

‘‘बरसात होती नहीं होगी तो फसल कहां से होगी। ऊपर से तुम्हारे लिए इतना खर्च और खर्च के हिसाब से आप लोग इतना कार्य नहीं करते। अब यह सब नहीं चलेगा। समझ गए न सब लोग। इस बार रेगिस्तान में बरसात होनी चाहिए। इस बार नहीं बरसे तो ठीक नहीं रहेगा।’’

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बादलों के सरदार ने सभी बादलों को साथ लिया। समुद्र से पानी भरा। धरती पर कुछ जगह बरसात कर दी। सावन की पहली बरसात थी। पृथ्वी पर सभी बहुत खुश हुए। दूसरे दिन बादलों ने फिर पानी भरा और बरसात करने चले। कुछ बादल हरियाली देखकर चेरापूंजी में रम गए। कुछ बादल मुंबई पर बरसात करके चले गए। आधा सावन यूं ही निकल गया। कुछ बादल आलसी थे। पानी भरते और आस-पास ही बरस जाते। इससे उन इलाके में बाढ़ की स्थिति बन गई। दूर-दराज का मैदानी इलाका सूखा रह गया। भगवान इंद्र को खबर मिली कि बादल जान-बूझकर ऐसा कर रहे हैं। उन्होंने बादलों को डांट लगाई तो बादलों के सरदार ने कहा ‘‘क्या करें महाराज, पानी ज्यादा भरा होता है। मैं उड़ रहा था कि पहाड़ों से टकरा गया। टक्कर से सारा पानी वहीं बिखर गया।’’

एक बादल बोला ‘‘महाराज! मुंबई महानगर रास्ते में पड़ता है। वहां इतनी ऊंची-ऊंची इमारते हैं कि उड़ने का रास्ता ही नहीं मिलता। हम उन्हीं से टकरा जाते हैं। सारा पानी उस महानगर पर गिर जाता है।’’

भगवान इंद्र ने कहा, ‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। पृथ्वी पर सभी जगह बरसात होनी चाहिए। जल अर्पित करना हमारा कर्तव्य है। राजस्थान के लोग प्रार्थना कर रहे हैं। उन्हें जल्दी से जल्दी पानी पहुंचाओ। बादलो ने फिर पानी भरा और राजस्थान की तरफ चल पड़े। राजस्थान में सूखा रेगिस्तान देख कर बादलों के सरदार ने कहा, ‘‘यहां बरसात करके क्या करोगे। यहां तो हरियाली ही नहीं है। चलो आगे चलते हैं।’’
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पीछे-पीछे पानी से भरी एक नन्ही बदली आ रही थी। उसने देखा कि पास खड़ा मोर आंखों में आंसू लिए उसे निहार रहा था। सूखा-सा पौधा रेत में चांदी  की तरह चमकते हुए अपनी रूखी जटाएं आसमान को दिखा रहा था। बिल्कुल शांत रेगिस्तान अपनी बांहें फैलाए उस नन्ही बदली को प्यार से बुला रहा था। यह देख कर वह भाव-विभोर हो गई और उन पर जमकर बरस गई।

फिर बोली, ‘‘रुको, मैं और पानी लेकर आती हूं। नन्ही बदली गई और फिर से पानी लेकर आई। साथ में अपनी और सहेलियों को भी ले आई। उन सबने मिलकर रेगिस्तान में खूब बरसात की। नन्ही बदली व उसकी नन्ही सहेलियों ने देखा कि  मोर पंख फैलाकर नाच रहा था और पौधों के पत्ते जैसे बहुत लम्बे समय बाद नहाए हों। नहाया हुआ रेगिस्तान नन्ही बदली को प्यार से निहार रहा था और आशीर्वाद दे रहा था। नन्ही बदली और उसकी सहेलियां यह दृश्य देख मंत्रमुग्ध हो गईं। उन्हें रेगिस्तान धरती पर सबसे खूबसूरत लग रहा था। उन्होंने फैसला किया कि अब वे हमेशा रेगिस्तान ही आएंगी और जम कर बरसेंगी।        —नरेश मेहन

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