Edited By Prachi Sharma,Updated: 15 Jan, 2026 01:50 PM

Shri Sakkubai Katha : भक्त की सच्चे मन से निकली करुण पुकार कभी निष्फल नहीं होती। चाहे वह कितनी ही मंद क्यों न हो, वह तीनों लोकों को पार करती हुई ईश्वर तक अवश्य पहुंचती है और उनके हृदय को उसी क्षण पिघला देती है। जब से भगवान हैं, तभी से उनके भक्त भी...
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Shri Sakkubai Katha : भक्त की सच्चे मन से निकली करुण पुकार कभी निष्फल नहीं होती। चाहे वह कितनी ही मंद क्यों न हो, वह तीनों लोकों को पार करती हुई ईश्वर तक अवश्य पहुंचती है और उनके हृदय को उसी क्षण पिघला देती है। जब से भगवान हैं, तभी से उनके भक्त भी हैं। जैसे भगवान और उनकी लीलाएं अनादि हैं, वैसे ही भक्तों की कथाएं भी सनातन हैं। भगवान की कोई भी लीला भक्तों के बिना पूर्ण नहीं होती, क्योंकि भक्त ही उन लीलाओं के साक्षी और सहभागी होते हैं। ऐसे ही एक अनुपम भक्त-भगवान संबंध की कथा है भगवान विट्ठल और उनकी परम भक्त सखूबाई की।
सखूबाई: दुःखों में भी मुस्कुराती भक्त
महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के किनारे बसे कन्हाड़ गांव की रहने वाली सखूबाई एक सरल, निष्कलंक हृदय की स्त्री थीं। वे एक ब्राह्मण परिवार की बहू थीं, लेकिन उनका जीवन अत्यंत कष्टमय था। उनके सास-ससुर और पति कठोर स्वभाव के थे और वे सखूबाई को आए दिन अपमानित करते, मारते-पीटते और कठोर परिश्रम कराते थे। बिना भोजन और विश्राम के भी सखूबाई अपने कर्तव्यों का पालन करती रहीं। इन सब अत्याचारों के बावजूद वे इसे अपने पूर्व कर्मों का फल मानकर सहती रहीं और मन में कभी शिकायत नहीं लाई। उनके जीवन का एकमात्र सहारा भगवान विट्ठल की भक्ति थी।
दर्शन की अभिलाषा और बंधन की पीड़ा
आषाढ़ शुक्ल एकादशी के अवसर पर पण्ढरपुर में लगने वाले विशाल मेले में जब सखूबाई ने भक्तों को “विट्ठल-विट्ठल” का कीर्तन करते देखा, तो उनके मन में भी भगवान पाण्डुरंग के दर्शन की तीव्र इच्छा जाग उठी। वे पड़ोसिन के साथ यात्रा पर निकल पड़ीं, लेकिन यह बात जैसे ही घरवालों को पता चली, उन्हें निर्दयता से वापस लाया गया। सास-ससुर और पति ने उन्हें खंभे से कसकर बांध दिया और कई दिनों तक बिना भोजन के छोड़ दिया।
बंधनों में जकड़ी सखूबाई ने टूटे स्वर में भगवान से प्रार्थना की हे प्रभु, मेरे पास आपके सिवा कुछ नहीं है। यदि एक बार आपके दर्शन हो जाते, तो मेरा जीवन सफल हो जाता।
भक्त की पुकार और भगवान का अवतार
सखूबाई की आर्त प्रार्थना ने भगवान विट्ठल के हृदय को द्रवित कर दिया। वे उसकी पड़ोसिन का रूप धारण कर वहां पहुंचे और सखूबाई को आश्वासन दिया कि वह उसके स्थान पर बंधन में रहेंगे। भगवान ने स्वयं उसके बंधन खोले और सखूबाई को पण्ढरपुर दर्शन के लिए भेज दिया। उस दिन केवल उसके शरीर के बंधन नहीं टूटे, बल्कि जन्म-जन्म के सारे बंधन समाप्त हो गए।
भगवान बने सेवक
उधर भगवान विट्ठल सखूबाई के रूप में घर में बंधे रहे। सास-ससुर के तानों और अपमान को वे शांत भाव से सहते रहे। कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहने के बाद जब पति को भय हुआ कि कहीं बहू मर न जाए, तब उसने भगवान को बंधन से मुक्त किया। सखूबाई के लौटने तक भगवान वहीं रुक गए और घर के सभी काम करने लगे पानी भरना, झाड़ू लगाना, भोजन पकाना। उनके हाथों का बना भोजन ऐसा प्रभावशाली था कि धीरे-धीरे सास-ससुर और पति का हृदय परिवर्तन हो गया।
सखूबाई का देह त्याग और पुनर्जीवन
पण्ढरपुर पहुंचकर भगवान के दर्शन करते ही सखूबाई प्रेम में इतनी लीन हो गईं कि वहीं समाधि में लीन होकर शरीर त्याग दिया। भगवान की इच्छा से रुक्मिणी माता ने उन्हें नया शरीर प्रदान किया और वे पुनः अपने गांव लौट आईं।
पश्चात्ताप और भक्ति का मार्ग
जब सखूबाई को यह ज्ञात हुआ कि स्वयं भगवान ने उसके लिए इतने दिनों तक कष्ट सहे, तो वह भावुक हो उठी। सास-ससुर और पति भी अपने कृत्यों पर पछताए और भगवान से क्षमा मांगकर भक्ति के मार्ग पर चल पड़े। यह कथा सिखाती है कि सच्ची और निष्काम भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भगवान स्वयं भक्त के कष्ट हरने के लिए सब कुछ त्याग देते हैं।