दुनिया का एकमात्र गणेश मंदिर, जहां परिवार संग विराजमान हैं गणपति बप्पा (Pics)

Edited By Updated: 15 Jan, 2017 04:43 PM

trinetra ganesh mandir

राजस्थान के रणथंभौर किले में त्रिनेत्र गणेश जी विराजमान हैं। यह मंदिर बहुत पुराना है। इस गणेश प्रतिमा को प्रथम गणेश या त्रिनेत्र गणेश के रूप में जाना जाता

राजस्थान के रणथंभौर किले में त्रिनेत्र गणेश जी विराजमान हैं। यह मंदिर बहुत पुराना है। इस गणेश प्रतिमा को प्रथम गणेश या त्रिनेत्र गणेश के रूप में जाना जाता है। यह दुनिया का एकमात्र मंदिर है जहां श्रीगणेश अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। कहा जाता है कि यहां पर प्रतिदिन दस हजार पत्र आते हैं। कहा जाता है कि 1299 में राजा हमीर अौर अलाउद्दीन खिलजी के मध्य जब युद्ध चला तो हम्मीर ने प्रजा अौर सेना के लिए ढेर सारा खाद्यान अौर जरुरत की चीजें रखवा ली थी। युद्ध लंबे समय तक चला। जिसके कारण हर चीज की तंगी होनी शुरु हो गई थी। राजा हताश अौर परेशान हो गया। वह भगवान गणेश का भक्त था। एक दिन राजा के स्वप्न में श्री गणेश ने आकर आश्वासन दिया कि उनकी समस्या शीघ्र दूर हो जाएगी। अगले दिन किले की दीवार पर त्रिनेत्र गणेश की प्रतिमा अंकित हो गई। शीघ्र युद्ध समाप्त हो गया। उसके बाद राजा ने त्रिनेत्र गणेश मंदिर का निर्माण करवाया। 

 

भक्त यहां अपने लड़का-लड़की के विवाह का प्रथम निमंत्रण भगवान गणेश जी को देते हैं। पहले यहां पर निमंत्रण के रूप में पीले चावल दिए जाते थे। भक्तों द्वारा भेजे पत्रों को प्रतिदिन पुजारी श्रीगणेश के सामने पढ़ता है। डाकिया इन दुर्गम रास्तों से होता हुआ प्रतिदिन मंदिर में पत्र पहुंचाता है। मंदिर में हिंदी या अंग्रेजी पत्रों को पुजारी पढ़ता है। इसके अतिरिक्त अन्य भाषा में आए पत्रों को खोलकर गणेश जी के सामने रख दिया जाता है। भक्तों का मानना है कि गणेश जी पत्रों द्वारा उनकी व्यथा को सुनते हैं अौर उनके कष्टों को दूर करते हैं। 

 

कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण अौर देवी रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूलवश श्रीगणेश को निमंत्रण नहीं भेजा गया। जिससे उनके वाहन मूषक को गुस्सा आ गया। मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा कुतर दिया कि उस पर चल पाना असंभव हो गया। इस रुकावट को दूर करने के लिए भगवान गणेश से प्रार्थना की गई अौर उनके खुश होने के बाद ही विवाह संपन्न हुआ। कहा जाता है कि तब से ही गणेश जी को प्रथम निमंत्रण भेजने की प्रथा चली आ रही है। प्रतिदिन आने वाले हजारों पत्रों को नष्ट नहीं किया जाता। वर्ष भर इन पत्रों को संभालकर रखा जाता है। बाद में उनकी लुगदी बनाकर विभिन्न क्रियाओं से गुजार कर फिर कागज बना लिया जाता है।


 

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