भगवान शंकर को समर्पित है विरूपाक्ष मंदिर, जानें कहां है?

Edited By Updated: 16 Nov, 2021 12:27 PM

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आज 16 नवंबर को भौम प्रदोष व्रत मनाया जा रहा है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार ये दिन देवों के देव महादेव को समर्पित है। जिस कारण इस विधि विधान से इस दिन इनका पूजन किए जाने का विधान है।

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आज 16 नवंबर को भौम प्रदोष व्रत मनाया जा रहा है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार ये दिन देवों के देव महादेव को समर्पित है। जिस कारण इस विधि विधान से इस दिन इनका पूजन किए जाने का विधान है। ज्योतिष मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल यानि संध्या के समय पूजा करना अत्यंत लाभकारी रहता है। तो वहीं इस दिन शिव मंदिरों में जाकर इनके विभिन्न स्वरूपों के दर्शन करने मात्र से ही जातक को अपने जीवन की परेशानियों से राहत मिलती है। तो आइए प्रदोष व्रत के उपलक्ष्य में जानते हैं शिव जी अति प्रसिद्ध मंदिर के साथ-साथ प्रमुख मंदिरों के बारे में जहां विष्णु जी विराजमान हैं। 

श्री सोमेश्वर स्वामी मंदिर
गुजरात के सोमनाथ में स्थित श्री सोमेश्वर स्वामी मंदिर शिवजी के 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है। पश्चिमी घाट पर स्थित इस मंदिर को 11वीं से 18वीं सदी के बीच विदेशी आक्रमणकारियों ने कई बार नुक्सान पहुंचाया परंतु हर बार इसका पुन: निर्माण करवाया गया। वर्तमान भव्य मंदिर को सरदार वल्लभभाई पटेल के दिशा-निर्देशों पर बनाया गया। आजादी के बाद मंदिर के ध्वस्त अवशेषों को देखने के बाद उन्होंने इस मंदिर का निर्माण शुरू करवाया था जिसकी प्राण प्रतिष्ठा तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने 11 मई, 1951 को रखी थी। 

विरूपाक्ष मंदिर
कर्नाटक के हम्पी में स्थित विरूपाक्ष मंदिर भगवान शिव के एक रूप विरूपाक्ष को समर्पित है। मूल रूप से 9वीं तथा 10वीं सदी में बने इस मंदिर का बाद में विजयनगर के शासकों ने और विस्तार किया। मंदिर के स्तंभों से भरे गलियारे बेहद प्रसिद्ध हैं जिन पर बहुत सुंदर नक्काशी तथा कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। मन्दिर के पूर्व में पत्थर का एक विशाल नंदी है जबकि दक्षिण की ओर गणेश जी की विशाल प्रतिमा है। यहां नृसिंह की 6.7 मीटर ऊंची एक मूर्ति भी है। विरूपाक्ष मंदिर का प्रवेश गोपुरम हेमकुटा पहाड़ियों व आसपास की अन्य पहाडिय़ों पर रखी विशाल चट्टानों से घिरा है। इन चट्टानों का संतुलन हैरान कर देने वाला है।

श्री विष्णुपद मंदिर
बिहार के गया में स्थित श्री विष्णुपद मंदिर को वर्ष 1787 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था। मंदिर में विष्णु भगवान के पद चिन्हों की छाप मौजूद है। मान्यता है कि मंदिर में भगवान विष्णु का चरण चिह्न ऋषि मरीची की पत्नी माता धर्मवत्ता की शिला पर है। राक्षस गयासुर को स्थिर करने के लिए धर्मपुरी से माता धर्मवत्ता शिला को लाया गया था जिसे गयासुर पर रख भगवान विष्णु ने अपने पैरों से दबाया। इसके बाद शिला पर भगवान के चरण चिन्ह बन गए। विश्व में विष्णुपद ही ऐसा स्थान है जहां भगवान विष्णु के चरणों के साक्षात दर्शन कर सकते हैं।   

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