कैसे होते हैं खूनी नागा साधु, कहां से मिलती हैं खूनी साधु बनने की ट्रेनिंग

Edited By Updated: 18 Jan, 2019 02:06 PM

who is khuni naga sadhu

जैसा कि सभी जानते ही हैं कि कुंभ का शाही स्नान मकर संक्रांति के दिन यानि 15 जनवरी से शुरू हो चुका है और आपको जानकर हैरानी होगी कि शाही स्नान के पहले दिन ही करीब 1 करोड़ साधुओं ने गंगा में डुबकी लगाई। प्रयागराज ये सिलसिला अभी भी जारी है जो कुल 50...

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जैसा कि सभी जानते ही हैं कि कुंभ का शाही स्नान मकर संक्रांति के दिन यानि 15 जनवरी से शुरू हो चुका है और आपको जानकर हैरानी होगी कि शाही स्नान के पहले दिन ही करीब 1 करोड़ साधुओं ने गंगा में डुबकी लगाई। प्रयागराज ये सिलसिला अभी भी जारी है जो कुल 50 दिनों तक यानि 4 मार्च तक ऐसे ही चलता रहेगा। बता दें कि कुंभ का आयोजन हर 3 साल में एक जगह पर होता है। संगम में पवित्र डुबकी लगाने का ये मनोहर दृश्य कुंभ की रौनक में और भी चार-चांद लगाता नज़र आ रहा है। भक्ति के सागर में डूबे साधुओं को इस ठिठुरती ठंड का एहसास तक नहीं हो रहा है। वो तो बस मन में श्रद्धा लिए गंगा में डुबकी लगाए जा रहे हैं।
PunjabKesariआइए जानते हैं आस्था के सबसे बड़े आयोजन की शान यानि नागा साधुओं के रहस्मयी जीवन के बारे में, जो शायद आम इंसान की सोच से बिल्कुल परे हैं। साधारण जीवन जीने वाले लोगों के बीच नागा साधु हमेशा से ही कौतूहल का विषय रहे हैं। ये नागा साधु कैसे और क्‍यों बनते हैं जैसे कई और सवाल होते हैं जो हम सब के मन में जिज्ञासा पैदा करते हैं।
PunjabKesariवैसे तो सभी नागा साधु दिखने में एक जगह जैसे होते हैं, उनके रहने का ढंग, उनका भव्य तरीके से श्रृंगार करना सब बिल्कुल एक समान सा लगता है लेकिन असल में ऐसा नहीं है। क्योंकि एक जैसे दिखने वाले ये नागा साधु भी एक तरीके के नहीं होते हैं। बता दें कि नागा साधु दो प्रकार के होते हैं एक बर्फ़ानी नागा और तो दूसरे खूनी नागा।
PunjabKesariवैसे इन नागा साधुओं के बारे में उनके नाम से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। दरअसल नागा साधु बनने की परंपरा के अनुसार सिर्फ़ हरिद्वार और उज्‍जैन में आयोजित होने वाले कुंभ में ही नागा साधु बनने की दीक्षा दी जाती है। जिन्‍हें हरिद्वार में दीक्षा दी जाती है उन्‍हें बर्फ़ानी नागा कहा जाता है तो वहीं जिन्‍हें उज्‍जैन में नागा साधु बनने की दीक्षा दी जाती है, उन्‍हें खूनी नागा साधु कहा जाता है।

खूनी नागा साधु अपने नाम की तरह ही धर्म के रक्षक होते हैं। खूनी साधु ज़रूरत पड़ने पर खून भी बहा सकते हैं। ये हमेशा अस्त्र-शस्त्र धारण किए होते हैं। बता दें कि अखाड़े में जब भी कोई व्‍यक्ति साधु बनने के लिए आता है तो उसे सीधे तौर पर शामिल नहीं किया जाता। पहले अखाड़ा अपने स्‍तर पर उसकी जांच-परख की जाती है फिर उसके बाद ये तय किया जाता है उसकी दीक्षा उज्‍जैन में होगी या फिर हरिद्वार में। अगर वो व्‍यक्ति साधु बनने के लिए योग्‍य नहीं माना जाता तो उसे बाहर कर दिया जाता है।

अखाड़ों का निर्माण
कहा जाता है कि जब अखंड भारत को खंडित करने के साथ धन-सम्पदा को नष्ट करने के लिए विदेशी आक्रमणकारी भारत आने लगे तो आदि शंकराचार्य ने अखाड़ों की स्थापना की। उनका मानना था कि आक्रमणकारियों से निपटने के लिए पूजा-पाठ के साथ शारीरिक श्रम व अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भी साधुओं को मिलनी चाहिए। इसी मकसद से आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में 7 अखाड़ों की खुद स्थापना की। आदि शंकराचार्य ने खुद महानिर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आवाहन, अग्नि और आनंद अखाड़े की स्थापना की और आज के समय में इन अखाड़ों की संख्या 7 से बढ़कर 14 हो गई है।
PunjabKesariनागा साधु बनने की प्रक्रिया किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होती है। नागा साधु बनने के लिए घर परिवार, मोह माया का त्याग कर भक्ति के रंग में रम जाना होता है और यहीं से शुरू होती है नागा साधु बनने की ट्रेनिंग। इस अग्निपरीक्षा में बैठने से पहले उन्हें अपना घर बार छोड़कर आना होता है। अखाड़ों का एक नियम ये भी है कि नागा साधुओं को बस्ती के बाहर ही निवास स्थान खोजना होगा। संन्यासी के अलावा वो न किसी को प्रणाम करेगा न ही किसी की निंदा करेगा। दीक्षा लेने वाले हर नागा साधु को इसका पालन करना पड़ता है।
 

संगमनगरी में लगे कुंभ में इन अखाड़ों की अजब-गजब दुनिया देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए किसी कौतूहल से कम नहीं है। इन अखाड़ों में जूना अखाड़े का जलवा सबसे ज्यादा है। जूना अखाड़े के नागा साधु युद्ध कला में माहिर रहते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि नागा साधुओं को दीक्षा लेने से पहले खुद का पिंडदान और श्राद्ध तर्पण करना पड़ता है और पिंडदान व श्राद्ध के बाद गुरु जो नया नाम और पहचान देता है, उसी नाम से जाना जाता है। नागा साधु की दीक्षा देने से पहले उसके स्वयं पर नियंत्रण की स्थिति को परखा जाता है। तीन साल तक दैहिक ब्रह्मचर्य के साथ मानसिक नियंत्रण को परखने के बाद ही नागा साधु को दीक्षा दी जाती है।

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आपको बता दें कि सिर्फ हिंदू धर्म के व्यक्ति ही नागा साधु बन सकते है। अन्य किसी धर्म के व्यक्ति को नागा साधु बनने की अनुमति नहीं मिल सकती। हिंदू धर्म के किसी भी जाति का कोई व्यक्ति नागा साधु बनने की प्रक्रिया व परीक्षा पास करने के बाद नागा साधु बन सकता है। बता दें कि नागाओं की परीक्षा तब और कठिन हो जाती है जब उनको दो वक्त का खाना भी नहीं दिया जाता। नागाओं को एक दिन में एक ही समय भोजन करना होता है वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है। एक नागा साधु को सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है। अगर सातों घरों से भिक्षा न मिले, तो उन्हें भूखे ही रहना पड़ता है। तो वहीं नागाओं को बिस्तर लगाकर सोने की भी अनुमति नहीं होती। अगर कोई साधु ऐसा करता है तो उनको नागा साधु की श्रेणी से बाहर किया जा सकता है। इसलिए नागा साधु सिर्फ ज़मीन पर सोते हैं। दिसंबर-जनवरी की ठिठुरती ठंड में भी नागा साधु ज़मीन पर ही सोते हैं।

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इनकी कठिन परीक्षा यहीं खत्म नहीं होती बल्कि दीक्षा लेने के लिए इन्हें अपने कपड़ों का भी त्याग करना पड़ता है। नागा साधु को दीक्षा के दौरान वस्त्र त्याग करने के साथ चोटी का भी त्याग करना होता है। वस्त्र के नाम पर भस्म और रुद्राक्ष धारण करने की अनुमति होती है। वस्त्र अगर धारण करना होता है तो सिर्फ़ गेरुए रंग का एक वस्त्र ही धारण किया जा सकता है। ये सभी बातें इस बात का सबूत है कि सच में इनका जीवन कठिन होता है ये हमारी सोच से बहुत ऊपर है। लेकिन यही नागा साधु कुंभ के मेले की शोभा भी बनते हैं। जिनकी वजह से कुंभ देशभर में अपनी पवित्रता के लिए जाना जाता है।
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