स्वार्थी चीन के लिए वेनेजुएला की कोई वैल्यू नहीं, अमेरिकी एक्शन पर दिखाई झूठी हमदर्दी ! असली मोहरा तो...

Edited By Updated: 13 Jan, 2026 12:15 PM

china loses a space ally with ouster of venezuela s maduro

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़े जाने से चीन हैरान है। बीजिंग ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की बात तो की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। विश्लेषकों के अनुसार चीन टकराव नहीं, नुकसान सीमित करने की रणनीति अपना रहा है।

 International Desk:स्वार्थी कूटनीति की मिसाल पेश करते हुए चीन ने वेनेजुएला के मुद्दे पर एक बार फिर अपना दोहरा चेहरा दिखा दिया है। अमेरिकी कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की दुहाई देने वाला बीजिंग दरअसल वेनेजुएला के लिए किसी वास्तविक लड़ाई के मूड में नहीं है। सच यह है कि चीन के लिए वेनेजुएला अब सिर्फ एक डूबता सौदा है, जिसकी ‘हमदर्दी’ महज़ बयानबाज़ी तक सीमित है, न कि किसी ठोस कदम तक। अमेरिकी बलों द्वारा 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अचानक हिरासत में लिए जाने से चीन पूरी तरह चौंक गया। हैरानी की बात यह रही कि मादुरो की गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले ही एक आधिकारिक चीनी प्रतिनिधिमंडल कराकस में उनसे मुलाकात कर रहा था। मादुरो चीन के करीबी सहयोगी माने जाते थे और वेनेजुएला लैटिन अमेरिका का इकलौता देश है, जिसके साथ चीन की उच्च-स्तरीय रणनीतिक साझेदारी थी। 

 

इसके बावजूद, चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संयमित रही। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बयान जारी कर कहा कि चीन-वेनेजुएला सहयोग दो संप्रभु देशों के बीच है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संरक्षित है।  उन्होंने यह भी कहा कि चीन के “वैध हितों” की रक्षा कानून के दायरे में की जाएगी। बीजिंग ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन किसी तरह की सैन्य या आर्थिक जवाबी कार्रवाई से परहेज किया। विशेषज्ञ एडम नी के अनुसार, यह चीन की व्यापक रणनीति को दर्शाता है। जहां उसके हित सीमित हों, वहां वह कूटनीतिक विरोध और नैतिक भाषण तक ही खुद को सीमित रखता है। चीन ने गैर-हस्तक्षेप और अमेरिकी “दादागिरी” की आलोचना तो की, लेकिन न तो अमेरिका पर कोई दंडात्मक कदम उठाया और न ही वेनेजुएला की ज़मीन पर हालात बदलने की कोशिश की। 

 

असल में, वेनेजुएला चीन के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम नहीं है। देश वर्षों से आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है और चीन को बार-बार कर्ज और तेल-समझौतों की शर्तें बदलनी पड़ी हैं। चीन वेनेजुएला से तेल तो खरीदता है, लेकिन उसकी कुल तेल जरूरतों का केवल 4% ही वहां से आता है। इसके उलट, वेनेजुएला चीन पर ज्यादा निर्भर है। चीन को चिंता इस बात की है कि मादुरो के साथ हुए समझौते अब खतरे में पड़ सकते हैं। कराकस पर चीन का कम से कम 10 अरब डॉलर का कर्ज है। यह स्थिति चीन के लिए नई नहीं है लीबिया में गद्दाफी के पतन के बाद भी उसे ऐसे नुकसान झेलने पड़े थे।

 

अमेरिकी कार्रवाई ने चीन को वैश्विक मंच पर अमेरिका को “अस्थिर और जबरदस्ती करने वाली ताकत” के रूप में पेश करने का मौका जरूर दिया है। बीजिंग इस घटना का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए कर रहा है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसका ताइवान पर चीन की नीति पर सीधा असर नहीं पड़ेगा।फिर भी कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यदि दुनिया ऐसे कदमों को स्वीकार करती रही, तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की सीमाएं और धुंधली हो सकती हैं। कुल मिलाकर, चीन इस पूरे घटनाक्रम से असहज जरूर है, लेकिन वेनेजुएला उसके लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि वह अमेरिका से सीधे टकराव का जोखिम उठाए।

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