गुलामी को कानूनी मान्यता! मौलवियों को अपराध करने पर भी सजा नहीं...इस देश ने बदले कानून

Edited By Updated: 28 Jan, 2026 01:51 AM

taliban s new law in afghanistan slavery is given legal recognition

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने अपने कानूनों में ऐसा बड़ा बदलाव किया है, जिस पर दुनियाभर में चिंता जताई जा रही है। तालिबान प्रशासन ने नया क्रिमिनल प्रोसीजर कोड लागू किया है, जिसमें गुलामी जैसी प्रथा को दोबारा कानूनी रूप से मान्यता देने और धार्मिक...

इंटरनेशनल डेस्कः अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने अपने कानूनों में ऐसा बड़ा बदलाव किया है, जिस पर दुनियाभर में चिंता जताई जा रही है। तालिबान प्रशासन ने नया क्रिमिनल प्रोसीजर कोड लागू किया है, जिसमें गुलामी जैसी प्रथा को दोबारा कानूनी रूप से मान्यता देने और धार्मिक नेताओं यानी मौलवियों को कानून से ऊपर रखने की व्यवस्था की गई है। इस फैसले के बाद मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी विवाद शुरू हो गया है।

मौलवियों पर केस नहीं चलेगा

तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने 58 पन्नों वाले इस नए कानून को मंजूरी दी है और इसे देश की अदालतों में लागू करने का आदेश दिया है। इस कानून में साफ लिखा है कि यदि कोई मौलवी या मुस्लिम धर्मगुरु अपराध भी करता है, तो उसके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। यानी अपराध साबित होने के बावजूद मौलवियों को सजा नहीं दी जाएगी, केवल उन्हें ‘सलाह’ देने की बात कही गई है।

अफगान समाज को चार वर्गों में बांटा गया

नए कानून के आर्टिकल-9 के तहत तालिबान ने अफगान समाज को चार कानूनी श्रेणियों में बांट दिया है—

  1. उलेमा (धार्मिक नेता/मौलवी)

  2. अशराफ (उच्च वर्ग)

  3. मध्यम वर्ग

  4. निचला वर्ग और गुलाम

इस कानून में ‘गुलाम (Slave)’ और ‘मालिक (Master)’ जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल किया गया है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि गुलामी को एक कानूनी सामाजिक श्रेणी के रूप में मान लिया गया है।

निचले वर्ग के लिए कड़ी सजा

मानवाधिकार संगठन रवादारी के अनुसार, अगर निचले वर्ग या गुलाम श्रेणी का कोई व्यक्ति अपराध करता है, तो उसे जेल की सजा के साथ-साथ शारीरिक दंड भी दिया जा सकता है। वहीं, इसी तरह का अपराध करने पर मौलवियों को किसी भी तरह की सजा नहीं दी जाएगी। इस असमान व्यवस्था को लेकर भारी नाराजगी जताई जा रही है।

शारीरिक हिंसा की नई परिभाषा

लंदन स्थित अफगान इंटरनेशनल मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नए कानून में शारीरिक हिंसा को भी बेहद सीमित रूप में परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार, जब तक हड्डी न टूटे या त्वचा फटे नहीं, तब तक उसे हिंसा नहीं माना जाएगा। कानून में यह भी कहा गया है कि पिता अपने 10 साल के बेटे को नमाज न पढ़ने जैसी बातों पर शारीरिक दंड दे सकता है।

मानवाधिकार संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया

नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट के मीडिया सेल ने इस कानून की आलोचना करते हुए कहा है कि तालिबान ने गुलामी को कानूनी दर्जा दे दिया है और अब अदालतें किसी व्यक्ति के अपराध पर उसकी सामाजिक हैसियत देखकर फैसला सुनाएंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून बुनियादी मानवाधिकारों, समानता और न्याय की अवधारणा के पूरी तरह खिलाफ है। इस नए कानून के बाद अफगानिस्तान में आम लोगों, खासकर निचले वर्ग और महिलाओं की स्थिति और अधिक कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है।

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