Edited By Mansa Devi,Updated: 27 Oct, 2025 04:10 PM

छठ पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक भी है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मईया को समर्पित है, जिसे खासतौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और प्रवासी भारतीय बड़ी श्रद्धा के साथ...
नेशनल डेस्क: छठ पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक भी है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मईया को समर्पित है, जिसे खासतौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और प्रवासी भारतीय बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में श्रद्धालु 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं और डूबते तथा उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
छठ पूजा क्यों है इको-फ्रेंडली
➤ सफाई और शुद्धता पर जोर
छठ पूजा की शुरुआत ही सफाई से होती है। श्रद्धालु नदी, तालाब या घाटों की सफाई कर पूजा की तैयारी करते हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में भी मदद करती है।
➤ बिना प्लास्टिक के पूजा सामग्री
इस पर्व में प्लास्टिक या कृत्रिम चीजों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। लोग बांस की डलिया या सूप में फल-फूल और प्रसाद लेकर जाते हैं। ये सभी चीजें प्राकृतिक होती हैं, जो आसानी से मिट्टी में गल जाती हैं और प्रदूषण नहीं फैलातीं।
➤ सूर्य की आराधना — प्रकृति का सम्मान
छठ पर्व का मूल उद्देश्य सूर्य की पूजा है। सूर्यदेव से जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य की कामना की जाती है। यह संदेश देता है कि मानव जीवन सौर ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, इसलिए प्रकृति की रक्षा जरूरी है।
➤ मौसमी फलों और सब्जियों का उपयोग
छठ पूजा में जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, वह पूरी तरह से मौसमी फल-सब्जियों से तैयार होता है जैसे नारियल, केला, गन्ना, मूली, पेठा, नींबू, सेब, शकरकंद आदि। इससे लोकल खेती को बढ़ावा मिलता है और प्रकृति से जुड़ाव भी बना रहता है।
➤ मिट्टी के दीपक और प्राकृतिक ईंधन
इस पर्व में मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं, जिनमें देसी घी या सरसों के तेल का इस्तेमाल होता है। ये दीपक पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित होते हैं और जलने के बाद मिट्टी में मिलकर भूमि को पोषक बनाते हैं।

सेहत से भी है गहरा कनेक्शन
छठ पर्व शरीर और मन दोनों को संतुलित रखने का संदेश देता है।
➤ सूर्य स्नान और अर्घ्य देना शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा प्रदान करता है और विटामिन D का स्रोत है।
➤ उषा काल में पूजा करने से नींद, पाचन और मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
➤ निर्जला उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है और अनुशासन सिखाता है।
➤ प्राकृतिक वातावरण में पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है और प्रकृति से जुड़ाव बढ़ता है।