Edited By SHUKDEV PRASAD,Updated: 27 Mar, 2026 11:47 PM

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते देशभर में एलपीजी की कीमतों और सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ रही है। इसी बीच अरुणाचल प्रदेश ने एक शानदार और पर्यावरण के अनुकूल समाधान पेश किया है।
नेशनल डेस्क: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते देशभर में एलपीजी की कीमतों और सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ रही है। इसी बीच अरुणाचल प्रदेश ने एक शानदार और पर्यावरण के अनुकूल समाधान पेश किया है।राजधानी ईटानगर के पास निर्जुली स्थित सेंट्रल कैटल ब्रीडिंग फार्म में बायोगैस प्लांट लगाकर गैस संकट से निपटने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है।
गोबर से बनी गैस, अब रसोई में जल रहा चूल्हा
इस फार्म में 30 क्यूबिक मीटर क्षमता वाले दो बायोगैस यूनिट शुरू किए गए हैं। यहां करीब 150 मवेशियों से रोजाना निकलने वाले 5-6 क्विंटल गोबर का इस्तेमाल अब स्वच्छ ईंधन बनाने में किया जा रहा है। इससे तैयार बायोगैस का उपयोग फार्म में रहने वाले 12 से ज्यादा परिवारों द्वारा खाना पकाने और रोशनी के लिए किया जा रहा है। इससे उनकी एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता काफी हद तक कम हो गई है।
गैस के साथ ‘खजाना’ भी: जैविक खाद से बढ़ेगी खेती
इस प्लांट की खास बात यह है कि इससे सिर्फ गैस ही नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर स्लरी भी निकलती है। यह स्लरी खेतों के लिए बेहतरीन जैविक खाद का काम करती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और किसानों का रासायनिक खाद पर खर्च भी घटता है।
पूरे राज्य में लागू होगा यह मॉडल
पशुपालन और दुग्ध विकास विभाग के मंत्री गेब्रियल डी. वांगसू ने इस पहल को बड़े स्तर पर लागू करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि राज्य के अन्य पशुपालन फार्मों में भी ऐसे बायोगैस प्लांट लगाए जाएंगे, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। उनका मानना है कि पशु अपशिष्ट का सही उपयोग ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करता है।
“कचरे से संसाधन” की दिशा में बड़ा कदम
प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह पहल न सिर्फ एलपीजी संकट का समाधान है, बल्कि एक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली की ओर भी बड़ा कदम है।इस मॉडल को अपनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है और साथ ही प्रदूषण को भी कम किया जा सकता है।
क्यों खास है यह पहल?
अरुणाचल प्रदेश का यह मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणा बन सकता है। जहां एक तरफ एलपीजी महंगा हो रहा है, वहीं दूसरी ओर यह तकनीक सस्ती, स्वदेशी और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है।