Edited By Anu Malhotra,Updated: 14 Feb, 2026 01:55 PM

दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बच्चों और किशोरों में बढ़ती क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) को लेकर एक बड़ा रेड अलर्ट जारी किया है। हाल ही में प्रकाशित एक वैश्विक शोध (Global Study) के अनुसार, किडनी की यह गंभीर बीमारी अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही,...
नई दिल्ली: दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बच्चों और किशोरों में बढ़ती क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) को लेकर एक बड़ा रेड अलर्ट जारी किया है। हाल ही में प्रकाशित एक वैश्विक शोध (Global Study) के अनुसार, किडनी की यह गंभीर बीमारी अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि 0 से 19 वर्ष के आयु वर्ग में इसके मामले खतरनाक स्तर पर पहुंच गए हैं।
75 लाख से ज्यादा नए मामले: क्या कहती है रिपोर्ट?
वर्ष 2021 के आंकड़ों पर आधारित इस व्यापक विश्लेषण में पाया गया कि एक ही साल में वैश्विक स्तर पर लगभग 75.3 लाख बच्चे और किशोर इस बीमारी की चपेट में आए। अध्ययन के अनुसार, प्रति 1 लाख बच्चों पर औसतन 29 नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं।
किशोरों पर सबसे बड़ा प्रहार
रिपोर्ट में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, वह है 14 से 19 वर्ष की आयु के किशोरों में बीमारी की रफ़्तार। पिछले कुछ वर्षों में इस आयु वर्ग में CKD के मामलों में 44% की भारी वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे ये मुख्य कारण हो सकते हैं:
- बदलती और अस्वस्थ जीवनशैली।
- फास्ट फूड और अत्यधिक नमक का सेवन।
- प्रारंभिक लक्षणों की अनदेखी और जांच में देरी।
क्षेत्रीय असमानता: मध्य एशिया और गरीब देश सबसे ज्यादा प्रभावित
यह बीमारी केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक विषमता का भी आईना है। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
हॉटस्पॉट्स: मध्य एशिया (Central Asia) में बच्चों में CKD के सबसे अधिक नए मामले सामने आए हैं।
आर्थिक प्रभाव: कम आय वाले देशों और विकासशील क्षेत्रों में मृत्यु दर और विकलांगता का जोखिम कहीं अधिक है।
सुविधाओं का अभाव: जहां डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट जैसी जीवन रक्षक सुविधाएं कम हैं, वहां बच्चों की स्थिति बेहद चिंताजनक है।

क्या 2050 तक सुधरेंगे हालात?
अध्ययन में एक अनुमान यह भी लगाया गया है कि यदि वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में सुधार होता है, तो 2050 तक नए मामलों की दर में मामूली गिरावट आ सकती है। हालांकि, यह सुधार केवल उन्हीं क्षेत्रों में संभव होगा जहां स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किया जाएगा। कमजोर स्वास्थ्य तंत्र वाले देशों में यह चुनौती और भी विकराल हो सकती है।
बचाव और समाधान: विशेषज्ञों की सलाह
डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का कहना है कि बच्चों को इस 'साइलेंट किलर' से बचाने के लिए 'अर्ली डिटेक्शन' (जल्द पहचान) ही एकमात्र रास्ता है।
नियमित जांच: यदि परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास है, तो बच्चों की नियमित जांच कराएं।
लक्षणों पर नज़र: थकान, पैरों में सूजन, या पेशाब की रंगत में बदलाव को हल्के में न लें।
बुनियादी ढांचा: सरकारों को विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में डायलिसिस और नेफ्रोलॉजी की सुविधाएं बढ़ानी होंगी।