दिल्ली HC का बड़ा फैसला: 'स्त्रीधन' की रिकवरी के लिए पुलिस हिरासत जरूरी नहीं, 80 साल के बुजुर्ग को मिली अग्रिम जमानत

Edited By Updated: 29 Sep, 2026 12:54 PM

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दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ़ 'स्त्रीधन' (शादी के समय महिला को मिला सामान या संपत्ति) वापस पाने के लिए कस्टोडियल पूछताछ (पुलिस हिरासत में पूछताछ) की ज़रूरत नहीं है।

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ़ 'स्त्रीधन' (शादी के समय महिला को मिला सामान या संपत्ति) वापस पाने के लिए कस्टोडियल पूछताछ (पुलिस हिरासत में पूछताछ) की ज़रूरत नहीं है। कोर्ट ने माना कि स्त्रीधन की रिकवरी ज़मानत कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती है। कोर्ट ने जांच अधिकारी के उस दावे पर भी सवाल उठाए कि एक बुज़ुर्ग आरोपी जांच में शामिल नहीं हुआ था। कोर्ट ने गौर किया कि कथित नोटिस ज़बानी तौर पर दिए गए थे और कोई केस डायरी पेश नहीं की गई थी।

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने यह टिप्पणी तब की जब वे लगभग 80 साल के एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी को अग्रिम ज़मानत दे रहे थे। यह मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें IPC की धारा 354, 354A, 376, 498A, 406 और 34 तथा BNS की धारा 74 के तहत आरोप लगाए गए थे।

कोर्ट ने गौर किया कि जांच अधिकारी ने शुरू में कहा था कि बार-बार नोटिस देने के बावजूद आरोपी जांच में शामिल नहीं हुआ। हालांकि, जब नोटिस दिखाने के लिए कहा गया, तो अधिकारी ने कहा कि वे ज़बानी तौर पर दिए गए थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि कथित नोटिस से जुड़ी कोई केस डायरी पेश नहीं की गई और कहा कि जांच अधिकारी की कार्रवाई भरोसे लायक नहीं लगी।

कोर्ट ने कहा कि उसे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि जांच अधिकारी ने आरोपी से जांच में शामिल होने की मांग नहीं की थी। कस्टोडियल पूछताछ के मुद्दे पर, कोर्ट ने गौर किया कि इसका एकमात्र मकसद शिकायतकर्ता का स्त्रीधन वापस पाना बताया गया था और कहा कि इस मकसद के लिए कस्टोडियल पूछताछ "बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं" है।

कोर्ट ने आगे कहा कि स्त्रीधन वापस न करने का मामला, उसकी रिकवरी के मकसद से ज़मानत कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। अदालत ने गौर किया कि तब तक शिकायतकर्ता ने अपने 'स्त्रीधन' (शादी के समय मिला सामान या पैसा) की वसूली के लिए कानून के मुताबिक कोई उचित कार्रवाई शुरू नहीं की थी।
शुरुआत में FIR, IPC की धाराओं 498A और 406 के तहत दर्ज की गई थी। बाद में, इसमें IPC की धाराएं 354, 354A और 376 तथा BNS की धारा 74 जोड़ी गईं। यौन दुर्व्यवहार के आरोप आरोपी पर लगाए गए थे, जो शिकायतकर्ता के ससुर हैं।

FIR के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने कई मौकों पर उसका यौन उत्पीड़न किया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की। आरोपों में से एक घटना के बारे में उसने कहा कि जब वह उनके पैर दबा रही थी, तो उन्होंने उसके हाथों को अपने प्राइवेट पार्ट्स की ओर खींचा। उसने यह भी आरोप लगाया कि मई 2022 में, उन्होंने उसे जबरदस्ती बिस्तर पर धकेल दिया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

आरोपी ने तर्क दिया कि ये आरोप उनके बेटे (शिकायतकर्ता के पति) पर उनके वैवाहिक विवाद के सिलसिले में दबाव बनाने के लिए लगाए गए थे। अभियोजन पक्ष ने अग्रिम ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि कस्टडी में पूछताछ ज़्यादा असरदार होती है और जांच अभी शुरुआती चरण में है। हाई कोर्ट ने 'अनेश कुमार बनाम बिहार राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक मामलों में गिरफ्तारी अपने आप या रूटीन तरीके से नहीं होनी चाहिए। साथ ही, अदालत ने चेतावनी दी कि वैवाहिक मामलों में यौन दुर्व्यवहार के आरोपों को झूठा नहीं माना जा सकता और हर मामले की जांच उसके अपने तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए।

अग्रिम ज़मानत के सीमित उद्देश्य के लिए आरोपों पर विचार करते हुए, अदालत ने गौर किया कि कथित यौन अपराध मई 2022 या उससे पहले हुए बताए गए थे, जबकि FIR 29 अप्रैल, 2026 को दर्ज की गई थी। अदालत ने यह भी देखा कि FIR में कथित अपराधों की कोई खास तारीख नहीं बताई गई थी और कहा कि उसे इतनी लंबी चुप्पी को सही ठहराने वाली कोई ठोस वजह नहीं मिली।

अदालत ने रिकॉर्ड में रखी पारिवारिक तस्वीरों पर भी विचार किया, जिनमें आरोपी, शिकायतकर्ता और उनका बच्चा एक साथ दिखाई दे रहे थे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि इन बातों पर सिर्फ़ अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी पर फ़ैसला करने के लिए विचार किया गया था और ट्रायल के दौरान पेश किए गए सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ही अंतिम फ़ैसला करेगा।

कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इस आशंका को भी खारिज कर दिया कि आरोपी के कनाडा में बसे होने के कारण उसके भागने का ख़तरा है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इस आधार पर आरोपी को उसकी आज़ादी से वंचित नहीं किया जा सकता और उसकी उम्र (लगभग 80 साल) का भी ध्यान रखा।
इसके बाद कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी मंज़ूर कर ली और निर्देश दिया कि गिरफ़्तारी की स्थिति में, आरोपी को 25,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक ज़मानत भरने पर ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए।

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि कनाडा की एक अदालत ने जोड़े के तीन साल के बच्चे की कस्टडी पति को दी थी। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी का मामला बच्चे की भलाई से जुड़ा है, न कि सिर्फ़ माता-पिता के बीच अधिकारों की होड़ का मामला है; साथ ही, कोर्ट ने बच्चे के लिए दोनों माता-पिता की सह-देखभाल (को-पेरेंटिंग) के महत्व पर भी ज़ोर दिया।

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