गाडगिल एक राष्ट्र निर्माता थे और सार्वजनिक नीति पर उनका प्रभाव गहरा था: जयराम रमेश

Edited By Updated: 08 Jan, 2026 12:56 PM

gadgil was a nation builder and his influence on public policy was profound

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बृहस्पतिवार को प्रख्यात पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल के निधन पर शोक व्यक्त किया और उनकी सराहना करते हुए उन्हें राष्ट्र निर्माता बताया जिनका सार्वजनिक नीति पर गहरा प्रभाव था।

नेशनल डेस्क: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बृहस्पतिवार को प्रख्यात पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल के निधन पर शोक व्यक्त किया और उनकी सराहना करते हुए उन्हें राष्ट्र निर्माता बताया जिनका सार्वजनिक नीति पर गहरा प्रभाव था। गाडगिल पश्चिमी घाटों पर अपने कार्य के लिए जाने जाते थे। उनका पुणे में निधन हो गया। परिवारिक सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि वह कुछ समय से बीमार थे।

सूत्रों के अनुसार, 83 वर्षीय गाडगिल ने बुधवार रात देर को पुणे के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। रमेश ने गाडगिल को एक उत्कृष्ट अकादमिक वैज्ञानिक, क्षेत्र विशेष पर निरंतर शोध करने वाला, एक अग्रणी संस्था निर्माता, उत्कृष्ट संप्रेषक, लोगों के नेटवर्क और आंदोलनों में दृढ़ विश्वास रखने वाला बताया। कांग्रेस नेता ने उनकी सराहना करते हुए उन्हें पांच दशकों से अधिक समय तक कई लोगों का मित्र, दार्शनिक, मार्गदर्शक और संरक्षक बताया।

जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, ‘‘आधुनिक विज्ञान के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित होने के बावजूद वह पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों खासकर जैव विविधता संरक्षण के प्रबल समर्थक थे।'' कांग्रेस नेता ने कहा कि गाडगिल का सार्वजनिक नीति पर प्रभाव गहरा था, जो 1970 के अंत और 1980 के शुरू में हुए ‘सेव साइलेंट वैली' आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका से स्पष्ट होता है। रमेश ने याद करते हुए कहा, ‘‘80 के दशक के मध्य में बस्तर के जंगलों को बचाने में उनका (गाडगिल का) हस्तक्षेप महत्वपूर्ण था।

बाद में उन्होंने भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण को एक नयी दिशा दी। 2009 से 2011 के दौरान उन्होंने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता की तथा इसकी रिपोर्ट अत्यंत संवेदनशील और लोकतांत्रिक तरीके से तैयार की जो विषयवस्तु एवं शैली दोनों में बेजोड़ है।'' रमेश ने बताया कि उन्होंने हार्वर्ड में ई.ओ. विल्सन के मार्गदर्शन में जीव विज्ञान का अध्ययन किया था, जिन्हें डार्विन का उत्तराधिकारी माना जाता था।

उन्होंने कहा कि विल्सन से प्रेरित होने के बावजूद गाडगिल विदेश में अध्ययन करने गए अधिकतर अन्य लोगों के विपरीत भारत लौट आए ताकि देश की शोध क्षमताओं और योग्यताओं का निर्माण किया जा सके, छात्रों का मार्गदर्शन किया जा सके, स्थानीय समुदायों के साथ जुड़ा जा सके और नीति में बदलाव लाया जा सके। रमेश ने कहा कि इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने बेहद प्रशंसनीय सफलता हासिल की। रमेश ने कहा कि तीन साल पहले उन्होंने अपना संस्मरण प्रकाशित किया, जो एक ही समय में शिक्षाप्रद, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक है।

पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि गाडगिल का जीवन विद्वता को समर्पित था तथा वह हमेशा एक प्रेरणादायक और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के रूप में याद किए जाएंगे। साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र ने गाडगिल को पश्चिमी घाट पर उनके मौलिक कार्य के लिए वार्षिक ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ' पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान है। गाडगिल भारत के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पश्चिमी घाट क्षेत्र पर जनसंख्या दबाव, जलवायु परिवर्तन और विकास गतिविधियों के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए गठित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल के अध्यक्ष रह चुके थे। 

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