Edited By Anu Malhotra,Updated: 23 Mar, 2026 11:43 AM

भारतीयों का सोने के साथ रिश्ता सिर्फ निवेश का नहीं, बल्कि भावनाओं का है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके घरों में रखा यह गहना अब देश की पूरी अर्थव्यवस्था (GDP) के आकार को भी पीछे छोड़ चुका है? हालिया आंकड़ों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। भारतीय...
नई दिल्ली: भारतीयों का सोने के साथ रिश्ता सिर्फ निवेश का नहीं, बल्कि भावनाओं का है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके घरों में रखा यह गहना अब देश की पूरी अर्थव्यवस्था (GDP) के आकार को भी पीछे छोड़ चुका है? हालिया आंकड़ों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की कुल कीमत अब 5 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 445 लाख करोड़ रुपये) के जादुई आंकड़े को पार कर गई है।
दिलचस्प बात यह है कि आईएमएफ के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुट के अनुसार, साल 2025-26 में भारत की कुल जीडीपी 4.125 ट्रिलियन डॉलर रहने की उम्मीद है। यानी भारत के घरों में जितना सोना रखा है, उसकी वैल्यू देश की सालाना कमाई से लगभग 125% ज्यादा है। सीधे शब्दों में कहें तो, अगर भारत के सभी घरों का सोना एक साथ रख दिया जाए, तो वह पूरे देश की अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक कीमती साबित होगा।
शेयर बाजार और बैंकों को पछाड़ा
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक ताजा रिपोर्ट इस मामले में और भी हैरान करने वाले तथ्य सामने लाती है। जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, घरों में रखा सोना अब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में लिस्टेड सभी कंपनियों की कुल वैल्यू (मार्केट कैप) को टक्कर दे रहा है। जहां बीएसई का मार्केट कैप 460 लाख करोड़ रुपये है, वहीं घरों का सोना 445 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच चुका है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारतीयों का भरोसा बैंक डिपॉजिट या शेयर बाजार से कहीं ज्यादा सोने पर है। आज की तारीख में घरों में जमा सोने की कीमत, लोगों द्वारा बैंकों में जमा किए गए पैसे और शेयर बाजार में लगाए गए निवेश के कुल योग का 1.75 गुना है। पिछले कुछ सालों में सोने के प्रति यह दीवानगी तेजी से बढ़ी है; मार्च 2019 में जो वैल्यू 109 लाख करोड़ रुपये थी, वह आज चार गुना बढ़ चुकी है।
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?
भले ही यह आंकड़ा व्यक्तिगत सुरक्षा के लिहाज से अच्छा लगे, लेकिन विशेषज्ञों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब लोग बैंक में पैसा जमा करने के बजाय सोना खरीदते हैं, तो वह पैसा 'डेड एसेट' बन जाता है, यानी वह बाजार में घूमकर विकास के काम नहीं आता।
चूंकि भारत अपनी सोने की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए सोने की भारी खरीद को एक तरह से घरेलू पूंजी का बाहर जाना माना जाता है। आज भारतीयों की गैर-रियल एस्टेट संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा सिर्फ सोने के रूप में बंद है।