Parliament Row: 'संसद की सीढ़ियां राजनीतिक रंगमंच दिखाने की जगह नहीं' राहुल गांधी के व्यवहार पर 200 पूर्व अधिकारियों का बड़ा कदम, खुला पत्र जारी

Edited By Updated: 17 Mar, 2026 03:16 PM

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संसद की गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर देश के प्रतिष्ठित नागरिकों और पूर्व सार्वजनिक सेवकों ने एक खुला पत्र लिखकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हालिया व्यवहार पर कड़ा ऐतराज जताया है। पत्र में 12 मार्च को संसद परिसर में हुई घटना का जिक्र करते...

नई दिल्ली: संसद की गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर देश के प्रतिष्ठित नागरिकों और पूर्व सार्वजनिक सेवकों ने एक खुला पत्र लिखकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हालिया व्यवहार पर कड़ा ऐतराज जताया है। पत्र में 12 मार्च को संसद परिसर में हुई घटना का जिक्र करते हुए इसे 'संसदीय परंपराओं का अपमान' करार दिया गया है। 

मामला है 12 मार्च को संसद परिसर के भीतर हुई उस घटना का, जिसे इन दिग्गजों ने 'लोकतंत्र के मंदिर' का अपमान करार दिया है। पूर्व आईपीएस अधिकारी एसपी वैद की अगुआई में कुल 204 प्रबुद्ध नागरिकों ने एक खुला पत्र जारी कर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और उनके साथियों के आचरण पर कड़े सवाल खड़े किए हैं।

इस पत्र का मुख्य बिंदु वह वाकया है जब राहुल गांधी और विपक्ष के कुछ सांसद संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय-बिस्कुट का आनंद लेते दिखे थे। पूर्व अधिकारियों का कहना है कि यह महज एक नाश्ता नहीं था, बल्कि सदन के भीतर लागू अनुशासन और स्पीकर के उन आदेशों की जानबूझकर की गई अवहेलना थी, जिसमें परिसर के भीतर किसी भी तरह के विरोध या धरने पर रोक लगाई गई थी। पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि संसद की सीढ़ियां कोई राजनीतिक रंगमंच या तमाशा दिखाने की जगह नहीं हैं, बल्कि वे उस गरिमा का हिस्सा हैं जहां देश की किस्मत लिखी जाती है।

समन्वयक एसपी वैद ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जब विपक्ष के नेता जैसा जिम्मेदार व्यक्ति ही नियमों को ठेंगा दिखाने लगे, तो इससे देश की संवैधानिक साख को चोट पहुँचती है। पत्र में इस व्यवहार को 'अहंकार और खास होने के भ्रम' से भरा बताया गया है। इन 204 गणमान्य नागरिकों ने मांग की है कि राहुल गांधी को अपनी इस 'पॉलिटिकल थियेट्रिक्स' के लिए पूरे देश से सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए।

उनका मानना है कि इस तरह के कृत्यों से न केवल जनता का पैसा और समय बर्बाद होता है, बल्कि संसद की गंभीर चर्चा वाली छवि भी धूमिल होती है। अंत में नागरिकों से भी अपील की गई है कि वे संस्थानों के सम्मान के लिए सजग रहें ताकि हमारी लोकतांत्रिक बुनियाद कमजोर न पड़े।

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