ज्ञानेश कुमार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, अर्जी पर 27 अक्टूबर को होगी सुनवाई

Edited By Updated: 06 Oct, 2026 06:57 PM

supreme court notice to gyanesh kumar hearing on the plea to be held on october

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी किये। दायर याचिका पर 27 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार ने मतदाता...

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी किये। दायर याचिका पर 27 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से जुड़े मामलों में एकतरफा फैसले लिए, जबकि उन्हें तीन सदस्यीय आयोग के फैसले के तौर पर पेश किया गया।

आप को बता दें कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह द्वारा मांगी गयी अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। विकास सिंह ने सीईसी को निलंबित करने या वैकल्पिक रूप से यह निर्देश देने का आग्रह किया था कि भविष्य के सभी फैसले सीईसी और दो निर्वाचन आयुक्तों वाले तीन सदस्यीय आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए जाएं। पीठ ने कहा कि वह आधिकारिक जवाब मिले बिना केवल अखबार की रिपोटर् के आधार पर कोई कारर्वाई नहीं कर सकती। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पक्ष रखा।

अदालत ने निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग और महानिदेशक (सूचना प्रौद्योगिकी) सीमा खन्ना को भी नोटिस जारी किया। पीठ ने कहा कि मुख्य मुद्दा‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023'की धारा 18 की व्याख्या से जुड़ा है और यह कि क्या आयोग के कामकाज में इसके प्रावधानों का पालन किया गया है। धारा 18 में प्रावधान है कि ईसीआई सर्वसम्मति से अपने कामकाज और काम के बंटवारे को विनियमित कर सकता है और जहां तक संभव हो, उसका कामकाज सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। जहां आयुक्तों के बीच मतभेद होता है, वहां बहुमत की राय मान्य होती है।

सिंह ने अदालत से आग्रह किया कि अंतरिम उपाय के तौर पर दो मार्च, 2023 के संविधान पीठ के फैसले में तय की गई व्यवस्था को बहाल किया जाए, जिसके तहत सीईसी और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली चयन समिति की सिफारिश पर की जानी थी। उन्होंने कहा कि इन आरोपों से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि इस चरण में यह नहीं माना जा सकता कि सभी विवादित फैसले एकतरफा लिए गये थे, क्योंकि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले अदालत को ठोस सबूतों की ज़रूरत होगी। याचिकाकर्ता ने 2023 के कानून की धारा 16 की ओर भी ध्यान दिलाया, जो ऐसे व्यक्ति को दीवानी या आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है जो सीईसी या चुनाव आयुक्त है या रह चुका है।

यह सुरक्षा उन्हें अपने आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या कथित पालन) के दौरान किए गए कामों या कही गई बातों के लिए मिलती है। उन्होंने 'है या रह चुका है' शब्दों का महत्व समझाते हुए कहा कि यह सुरक्षा न केवल पद पर रहते हुए मिलती है, बल्कि पद छोड़ने के बाद भी उनके कार्यकाल के दौरान किए गए आधिकारिक कामों के लिए लागू रहती है। उन्होंने तकर् दिया कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए ऐसी लगातार सुरक्षा बहुत ज़्यादा व्यापक है। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि न्यायाधीशों को भी ऐसी सुरक्षा नहीं मिलती। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि वे इस चरण में खुद छूट के प्रावधान को चुनौती नहीं दे रहे हैं। इस मामले पर संभवत: 26 अक्टूबर को सुनवाई होने की उम्मीद है।

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