बिना बहस वाले संसद के युग में चला गया भारत

Edited By ,Updated: 19 Mar, 2023 06:10 AM

india entered the era of parliament without debate

अमरीका स्थित फ्रीडम हाऊस ने भारत को ‘आंशिक रूप से मुक्त लोकतंत्र’ के रूप में डाऊनग्रेड किया है।

अमरीका स्थित फ्रीडम हाऊस ने भारत को ‘आंशिक रूप से मुक्त लोकतंत्र’ के रूप में डाऊनग्रेड किया है। स्वीडन के वी-डेम संस्थान ने भारत को चुनावी निरंकुशता के रूप में वॢणत किया है।इकोनॉमिस्ट इंटैलीजैंस यूनिट के डैमोक्रेसी इंडैक्स में भारत फिसल कर 53वें स्थान पर आ गया है। इस गिरावट में संसद के दोनों सदनों और उनके सदस्यों ने अपनी भूमिका निभाई है। भारत की संसदीय प्रणाली पर मेरी छोटी सूची में पाठक अपनी टिप्पणियों को शामिल कर सकते हैं। भारतीय लोकतंत्र कम हो गया है यहां मैं अपनी सूची प्रस्तुत कर रहा हूं :

1. राज्यसभा के प्रक्रिया नियमों के नियम 267 (लोकसभा में एक समान नियम है) को विपक्ष के सदस्यों द्वारा आवश्यक सार्वजनिक महत्व के मामले पर चर्चा करने के लिए लागू किया जाता है। पिछले कई महीनों में तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामलों पर चर्चा करने के लिए दोनों सदनों में कई बार नियम लागू किए गए हैं। भारत में चीनी घुसपैठ से लेकर हिंडनबर्ग रिसर्च एल.एल.सी. की रिपोर्ट तक।
सभापति ने हर प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। निष्कर्ष यह है कि जहां तक भारत की संसद का संबंध है, ‘अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व’ का कोई मामला नहीं जिस पर चर्चा करने की जरूरत है और दिन के कामकाज को जिससे अलग कर दें। आपको यह विश्वास करना होगा कि भारतीय लोग इतने सुरक्षित, निशिं्चत और संतुष्ट हैं कि उनसे संबंधित कोई भी बात संसद में तत्काल चर्चा के योग्य नहीं है।

प्रधानमंत्री राष्ट्रपति बन गए

2. प्रधानमंत्री यदि वह लोकसभा का सदस्य है तो सदन का नेता होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17वीं लोकसभा के नेता हैं। वह दोनों सदनों में कम ही उपस्थित होते हैं। वह हर साल राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हैं। मुझे उनके द्वारा किए गए किसी अन्य बड़े हस्तक्षेप की याद नहीं आती। संसद में सवालों के जवाब नहीं देने के दौरान पी.एम. मोदी का आम तौर पर एक मंत्री अपनी ओर से बोलता है (काश! हर बुधवार को हाऊस ऑफ कामन्स की तरह प्रधानमंत्री का प्रश्रकाल होता) मोदी का संसद के प्रति दृष्टिकोण जवाहर लाल नेहरू, डा. मनमोहन सिंह या अटल बिहारी वाजपेयी के दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है। प्रधानमंत्री ‘राष्ट्रपति’ बन गए हैं। यदि प्रधानमंत्री अध्यक्ष बने रहते हैं और अध्यक्षीय कार्य करते हैं तो भारत अधिक  समय तक एक  संसदीय लोकतंत्र नहीं रहेगा।
3. हाऊस ऑफ कामन्स की बैठक साल में 135 दिन होती है। 2021 में लोकसभा की 49 और राज्यसभा की 58 बैठकें हुईं। 2022 में लोकसभा और राज्यसभा दोनों की सिर्फ 56 बैठकें हुई। व्यवधानों के कारण कई बैठकें धुल गईं। अरुण जेतली ने एक बार कहा कि, ‘‘अड़चनवाद वैध संसदीय रणनीति का एक हिस्सा है।’’ 2010 का पूरा शीतकालीन सत्र एक मंत्री के इस्तीफे और एक जे.पी.सी. के गठन की मांग पर धुल गया था। उस सत्र में लोकसभा ने आबंटित समय का 6 प्रतिशत और राज्यसभा ने 2 प्रतिशत का उपयोग किया।

देरी से रणनीति में सुधार किया गया है। चालू बजट सत्र (द्वितीय भाग) में सत्ता पक्ष की ओर से हर दिन व्यवधानों का नेतृत्व किया गया है। कुछ बैठकें और अधिक व्यवधान संसद सत्रों को अप्रासंगिक बना देंगी। बिना किसी बहस के विधेयकों को पास किया जा सकता है (जैसा कि उन्होंने अतीत में किया है।) हम एक ऐसे समय पर विचार करना शुरू कर सकते हैं जब संसद साल में कुछ दिन बैठेगी। बिना किसी बहस और हंगामे के बीच सभी विधेयकों को संसद पारित कर देगी।

विपक्ष अपनी बात कहेगा, सरकार अपनी मनमानी करेगी : संसद के दोनों सदन वाद-विवाद के मंच हैं। भारत की संसद में बड़ी बहस हो चुकी है। 1962 का चीन-भारत युद्ध जिसमें भारत को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा था, पर बहस हुई थी। हरिदास मुंदड़ा की कम्पनियों के शेयरों में एल.आई.सी. के निवेश के आरोपों पर बहस हुई। बोफोर्स तोपों के आयात से जुड़े आरोपों पर कई बार बहस हुई। बाबरी मस्जिद विध्वंस पर बहस हुई। हमेशा बहस बिना वोट के खत्म हो जाती है।

संसदीय लोकतंत्र में सरकार को बहस से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसके पास हमेशा बहुमत वाले सदस्य होते हैं। फिर भी वर्तमान सरकार बहस की अनुमति देने से इंकार करती है। एक पुरानी कहावत है कि ‘विपक्ष अपनी बात कहेगा, सरकार अपनी मनमानी करेगी’। मुझे यकीन है कि सरकार को इस बात का डर नहीं है कि वह अपना ‘रास्ता’ खो देगी। सरकार को डर इस बात का है कि विपक्ष अपनी बात कहने के दौरान असहज करने वाली सच्चाइयों को सामने ला देगा। क्या भारत बिना बहस के संसद के युग में चला गया है? मुझे ऐसा डर है और अगर मेरा डर सच साबित होता है तो हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि संसदीय लोकतंत्र की विदाई का समारोह जल्द ही शुरू होगा।

5. कल्पना कीजिए कि संसद का सत्र बुलाया जाता है। कल्पना कीजिए कि सभी सदस्य ग्रेड हाल में एकत्रित होते हैं। कल्पना कीजिए कि सभी सदस्य गणराज्य के राष्ट्रपति के रूप में एक नेता का चुनाव करने के लिए मतदान करते हैं। प्रत्याशी के विरोध में कोई मत नहीं है। कोई परहेज नहीं है। वास्तव में देश परिणाम को लोगों के लोकतंत्र की जीत के रूप में मनाता है। क्या भारत में ऐसा हो सकता है? यह हो सकता है, क्योंकि हम लगातार एक दलीय शासन की ओर बढ़ रहे हैं।

अगर 15 राज्यों में एक पार्टी का शासन है और अगर वह पार्टी लोकसभा के 362 सदस्यों और राज्यसभा के 163 सदस्यों का चुनाव करने में सक्षम है तो भारत को एक और ‘पीपुल्ज रिपब्लिक’ बनने से कोई रोक नहीं सकता है। शुक्र है कि वह भयानक संभावना कुछ दूर है लेकिन इसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। जब भारत एक ‘पीपुल्स रिपब्लिक’ बन जाएगा तो भारत में संसदीय लोकतंत्र अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाएगा। -पी. चिदम्बरम

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