Edited By ,Updated: 31 Oct, 2026 03:57 AM

राष्ट्रीय एकता केवल नक्शे पर सीमाएं खींचने से सुरक्षित नहीं होती। यह इस पर निर्भर करती है कि विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और समुदायों के लोग एक सांझी राजनीतिक और सामाजिक परियोजना से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं या नहीं। भारत के लिए यह चुनौती स्वतंत्रता...
राष्ट्रीय एकता केवल नक्शे पर सीमाएं खींचने से सुरक्षित नहीं होती। यह इस पर निर्भर करती है कि विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और समुदायों के लोग एक सांझी राजनीतिक और सामाजिक परियोजना से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं या नहीं। भारत के लिए यह चुनौती स्वतंत्रता के बाद से काफी विकसित हुई है। रियासतों के एकीकरण ने संघ की क्षेत्रीय नींव रखी लेकिन तेज आर्थिक परिवर्तन, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और बदलती सामाजिक अपेक्षाओं के बीच एकता बनाए रखने का कार्य जारी है।
राष्ट्रीय एकता दिवस सरदार वल्लभभाई पटेल की विरासत को समकालीन भारत की चुनौतियों से जोड़कर देखने का अवसर प्रदान करता है। हर वर्ष 31 अक्तूबर को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय एकता दिवस सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता के बाद रियासतों के एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाई। भारत सरकार ने 2014 में इस दिवस की शुरुआत उनके योगदान को मान्यता देने तथा देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराने के लिए की। यह अवसर केवल स्मरण का दिन नहीं, यह भारत की राष्ट्रीय एकजुटता की नींव और उसे बनाए रखने की जिम्मेदारियों पर चिंतन को प्रोत्साहित करता है।
पटेल की उपलब्धि और संघ की नींव : 1947 की परिस्थितियों ने राजनीतिक एकीकरण को तत्काल प्राथमिकता बना दिया। स्वतंत्रता ने ब्रिटिश शासन का अंत किया लेकिन सैंकड़ों रियासतों को उभरते संघ के साथ अपने संबंध तय करने थे। उनका एकीकरण खंडित राजनीतिक परिदृश्य की बजाय एक कार्यशील देश बनाने के लिए आवश्यक था। भारत के प्रथम उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल ने वी.पी. मेनन और अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभाई। बातचीत और राजनीतिक समझ से अधिकांश राज्यों का विलय सुनिश्चित हुआ, हालांकि कुछ मामलों में अधिक जटिल उपायों की आवश्यकता पड़ी, जिनमें पटेल का दृढ़ संकल्प और राजनीतिक विवेक परिणाम के लिए केंद्रीय था।
नई चुनौती-विकास के माध्यम से एकता : भारत की समकालीन चुनौती रियासतों का एकीकरण नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि तेज राष्ट्रीय विकास सांझी प्रगति की भावना में परिणत हो। बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, बेहतर परिवहन संपर्क, डिजिटल कनैक्टिविटी और बढ़ते आर्थिक अवसर दूरस्थ क्षेत्रों को राष्ट्रीय बाजारों और संस्थानों से अधिक निकटता से जोड़ सकते हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों और पूर्वोत्तर में कनैक्टिविटी परियोजनाओं का प्रभाव न केवल गतिशीलता और सुरक्षा पर पड़ता है, बल्कि सेवाओं तक पहुंच और आर्थिक भागीदारी पर भी पड़ता है। हालांकि, विकास अकेले एकजुटता की गारंटी नहीं दे सकता। रोजगार, शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं और निवेश में क्षेत्रीय अंतर यह निर्धारित कर सकते हैं कि नागरिक संघ का अनुभव कैसे करते हैं। एक विश्वसनीय राष्ट्रीय दृष्टि में आर्थिक महत्वाकांक्षा के साथ स्थानीय जरूरतों पर ध्यान देना आवश्यक है। जब लोग अपने जीवन में ठोस सुधार देखते हैं और सार्वजनिक संस्थानों पर विश्वास रखते हैं, तो सांझी राष्ट्रीय परियोजना से जुड़ाव की भावना अधिक अर्थपूर्ण हो जाती है।
यहां सहकारी संघवाद महत्वपूर्ण है। भारत के पैमाने और विविधता के लिए बुनियादी ढांचे, उद्योग, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आंतरिक सुरक्षा पर संघ और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की आवश्यकता है। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद अपरिहार्य हैं, महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या संस्थान उन्हें रचनात्मक तरीके से प्रबंधित कर सकते हैं। जब सरकारें संवैधानिक जिम्मेदारियों और वैध क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए मिलकर काम करती हैं, तो राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।
विविधता, सामाजिक विश्वास और अगली पीढ़ी : भारत की ताकत आंशिक रूप से कई भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और क्षेत्रीय पहचानों को समायोजित करने की क्षमता में निहित है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक यह मानें कि उनकी पहचानें एक सांझे संवैधानिक और राजनीतिक ढांचे के भीतर सह-अस्तित्व कर सकती हैं। सामाजिक एकजुटता केवल आधिकारिक संदेशों से नहीं बनी रह सकती। इसके लिए जिम्मेदार सार्वजनिक विमर्श, नागरिकों के प्रति समान सम्मान और यह विश्वास आवश्यक है कि मतभेदों को लोकतांत्रिक संस्थानों के माध्यम से व्यक्त और हल किया जा सकता है।
युवा भारतीयों की इस प्रक्रिया में विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है। शैक्षिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, अंतर-राज्य यात्रा और देश के विभिन्न भागों के बारे में सीखने के अवसर क्षेत्रीय सीमाओं से परे परिचय बना सकते हैं। 2015 में घोषित ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ पहल राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच पारस्परिक समझ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का प्रयास करती है। ऐसी पहलें राष्ट्रीय एकीकरण को एक अमूर्त आदर्श की बजाय जीवंत अनुभव बना सकती हैं।
एकता एक निरंतर राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में : एकता दिवस सुरक्षा और समावेश के बीच संबंध को भी रेखांकित करता है। क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना राज्य की आवश्यक जिम्मेदारियां हैं लेकिन स्थायी स्थिरता उन परिस्थितियों को दूर करने पर भी निर्भर करती है जो समुदायों को अलग-थलग या असंतुष्ट छोड़ देती हैं। विकास, सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच और सार्थक भागीदारी शांति की नींव को मजबूत कर सकती है। पटेल की विरासत को ऐतिहासिक और समकालीन दोनों संदर्भों में समझा जाना चाहिए। उन्होंने एकजुट भारत की राजनीतिक नींव रखने में मदद की। वर्तमान पीढ़ी को लोकतांत्रिक संस्थानों, समावेशी विकास और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से संघ को एकजुट बनाए रखना होगा।
राष्ट्रीय एकता का मापदंड यह नहीं है कि हर नागरिक एक जैसा सोचे, बल्कि यह है कि विभिन्न पहचानों और हितों वाले लोग एक सांझा भविष्य सांझा कर सकें। जब भारत वैश्विक भूमिका बढ़ाने और अपने विकास लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास कर रहा है, तो यह अंतर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। राष्ट्रीय एकता दिवस याद दिलाता है कि एकता अतीत से विरासत में मिली पूर्ण उपलब्धि नहीं है। यह एक निरंतर राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, जो नागरिकता के दैनिक अनुभव के माध्यम से नवीनीकृत होती रहती है।-पूरन चंद सरीन, अदिल आजमी व नीलकांत बख्शी