भारत में बालिका शिक्षा के गंभीर हालात

Edited By Updated: 24 Sep, 2023 05:23 AM

serious situation of girl education in india

भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति 2023 रिपोर्ट जारी की है।

भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति 2023 रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े स्पष्ट तौर पर यह बताते हैं कि भारत के गांवों में अब बालिका शिक्षा को लेकर उत्साह बढ़ रहा है। सर्वेक्षण में यह दावा किया गया है कि आज भारत के 78 प्रतिशत ग्रामीण माता, पिता चाहते हैं कि उनकी बेटी ग्रैजुएशन या इससे आगे की पढ़ाई करे। जबकि 82 प्रतिशत अभिभावक अपने लड़कों को स्नातक या उससे आगे पढ़ाना चाहते हैं। 

सर्वेक्षण में दिए ये आंकड़े भारत में बालिका शिक्षा को लेकर बदलते नजरिए को उजागर करते हैं। लेकिन देखा जाए तो आज भी देश की आधी आबादी को शिक्षित करने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की राह में तमाम चुनौतियां हैं। बच्चियों की पढ़ाई की राह इतनी आसान आज भी नहीं है। इसी सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई छोडऩे वाले बच्चों में तीन चौथाई बालिकाएं और एक चौथाई बालक हैं। जो साफ तौर पर जाहिर करता है कि प्राथमिक स्तर पर गल्र्ज ड्रॉपआऊट का अन्नुपात लड़कों की तुलना में ज्यादा है। शिक्षा विशेषज्ञों की मानें तो आज भी भारत के कई गांव ऐसे हैं जहां हायर एजुकेशन के लिए स्कूल नहीं हैं। बच्चियों की पढ़ाई का स्तर क्या है इसे एक सर्वे रिपोर्ट से और समझा जा सकता है। 
 
भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट से यह पता चला कि वर्तमान में भारत के करीब 6.57 प्रतिशत गांवों में ही वरिष्ठ माध्यमिक कक्षा 11वीं और 12वीं यानी हायर एजुकेशन के लिए स्कूल हैं। देश के केवल 11 प्रतिशत गांवों में ही 9वीं और 10वीं की पढ़ाई के लिए हाई स्कूल हैं। यदि राज्यवार देखें तो आज भी देश के करीब 10 राज्य ऐसे हैं जहां 15 प्रतिशत से अधिक गांवों में कोई स्कूल नहीं है। गांवों में उच्च शैक्षिक संस्थानों की कमी के कारण माता, पिता बालिकाओं को बेसिक एजुकेशन के लिए स्कूलों में भर्ती ही नहीं करते। अगर एडमिशन करा भी दिया तो स्कूल दूर होने के कारण उसे प्राइमरी तक पढ़ाने के बाद घर बैठा लेते हैं क्योंकि हाई स्कूल और इंटर की पढ़ाई उनके गांवों में उपलब्ध नहीं होती 

डिवैल्पमैंट इंटैलीजैंस यूनिट द्वारा किए गए सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार गांवों के लगभग 37 प्रतिशत माता-पिता ने इस बात को माना है कि पारिवारिक कामों में हाथ बंटाने के कारण इनकी बेटियों को पढ़ाई बीच में ही  छोडऩी पड़ती है। साथ ही साथ 21.1 प्रतिशत अभिभावकों ने ये माना कि लड़की परिवार की घरेलू जिम्मेदारियों में अहम भूमिका निभाती है। मां के काम करने, बीमार रहने, छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने की जिम्मेदारी के कारण बेटियां अपनी पढ़ाई  बीच में ही छोड़ देती हैं।-सीमा अग्रवाल

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