Edited By jyoti choudhary,Updated: 19 Jan, 2026 12:54 PM

सोमवार, 19 जनवरी को भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली। कमजोर वैश्विक संकेतों, मुनाफावसूली और बड़े शेयरों में दबाव के चलते सेंसेक्स और निफ्टी 50 दोनों ही करीब 1% गिरकर दिन के निचले स्तर पर पहुंच गए।
बिजनेस डेस्कः सोमवार, 19 जनवरी को भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली। कमजोर वैश्विक संकेतों, मुनाफावसूली और बड़े शेयरों में दबाव के चलते सेंसेक्स और निफ्टी 50 दोनों ही करीब 1% गिरकर दिन के निचले स्तर पर पहुंच गए।
रिलायंस इंडस्ट्रीज, ICICI बैंक और HDFC बैंक जैसे दिग्गज शेयरों में तिमाही नतीजों के बाद आई बिकवाली ने बाजार पर सबसे ज्यादा दबाव डाला।
बाजार का हाल
बीएसई सेंसेक्स करीब 700 अंक या 0.80% गिरकर 82,898.31 के स्तर पर आ गया। वहीं निफ्टी 50 भी 0.80% की गिरावट के साथ 25,494.35 पर बंद होने के करीब कारोबार करता दिखा।
बीएसई मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स भी करीब 1% तक टूट गए।
बाजार में आई इस गिरावट से निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप पिछले सत्र के लगभग ₹468 लाख करोड़ से घटकर ₹466 लाख करोड़ से नीचे आ गया, जिससे निवेशकों की संपत्ति में ₹2 लाख करोड़ से ज्यादा की कमी दर्ज की गई।
बाजार गिरावट के प्रमुख कारण
1. ट्रम्प की टैरिफ धमकी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड मुद्दे को लेकर यूरोप के आठ देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। ट्रम्प के अनुसार, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड पर 1 जून से 25% तक आयात शुल्क लगाया जा सकता है, जो किसी समझौते तक लागू रहेगा। इस बयान के बाद ट्रेड वॉर की आशंका बढ़ गई है।
2. कमजोर तिमाही नतीजे
भारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजे अब तक मिले-जुले रहे हैं। खासकर आईटी और बैंकिंग सेक्टर के नतीजे बाजार की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा है।
3. FIIs की लगातार बिकवाली
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकवाली का सिलसिला जारी है। जनवरी में अब तक FIIs कैश सेगमेंट में ₹22,000 करोड़ से अधिक के शेयर बेच चुके हैं। जुलाई से ही FIIs भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।
4. यूनियन बजट 2026 से पहले सतर्कता
आगामी यूनियन बजट 2026 से पहले निवेशक सतर्क नजर आ रहे हैं। बाजार को चिंता है कि वित्तीय घाटा कम करने पर ज्यादा जोर देने से सरकार का पूंजीगत खर्च प्रभावित हो सकता है, जो आर्थिक विकास के लिए अहम माना जाता है।