अक्षय नवमी से जुडी ये कथा, जानते हैं आप?

Edited By Updated: 12 Nov, 2021 02:13 PM

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​​​​​​​आज यानि 12 नवंबर यानि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन आंवला पूजन का विधान है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार

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आज यानि 12 नवंबर यानि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन आंवला पूजन का विधान है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार आंवला सर्वाधिक स्वास्थ्यवर्धक और आयु बढ़ाने वाला फल होता है, इतना ही नहीं इसे अमृत के समान माना जाता है। बताया जाता है जिस तरह श्री हरि को तुलसी का पौधा प्रिय है, ठीक उसी तरह आंवला भगवान विष्णु का सबसे प्रिय फल माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार आंवले के वृक्ष में सभी देवी देवताओं का निवास होता है। बल्कि कहा जाता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से लेकर पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आवंले के पेड़ पर ही निवास करते हैं। जिस कारण इसका सनातन धर्म में आंवला नवमी का पर्व इतना महत्व रखता है। तो वहीं ये भी कहा जाता है इस दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बाल लीलाओं का त्याग करके वृंदावन की गलियों को छोड़कर मथुरा चले गए थे। ​इसके अलावा इस दिन से कई धार्मिक कथाएं व लोक मान्यताएं जुड़ी हैं तो आइए जानें- 

प्रचलित कथाओं के अनुसार है कि दक्षिण में स्थित विष्णुकांची राज्य के राजा जयसेन थे, जिनके इकलौते पुत्र का नाम था मुकुंद देव। एक बार की बात है कि  एक बार राजकुमार जंगल में शिकार खेल रहे थे, जिस दौरान उनकी नजर व्यापारी कनकाधिप की पुत्री किशोरी पर पड़ी। इसे देखते ही राजकुमार इस पर मोहित हो गए और उससे विवाह की इच्छा प्रकट की।

परंतु जब राजकुमार ने किशोरी को बताया तो कि उसके भाग्य में पति का सुख नहीं है। किशोरी ने बताया कि ज्योतिषी ने उसे बताया है कि विवाह मंडप में बिजली गिरने से उसके वर की तत्काल मृत्यु हो जाएगी। परंतु मुकुंद देव फिर भी किशोरी के साथ विवाह करने के प्रस्ताव पर अडिग रहे. उन्होंने अपने आराध्य देव सूर्य और किशोरी ने भगवान शंकर की आराधना की, तब भगवान शंकर ने किशोरी से भी सूर्य की आराधना करने को कहा।

भोलेनाथ की आज्ञा के अनुसार किशोरी ने गंगा तट पर सूर्य आराधना करनी प्रारंभिक कर दी। परंतु तभी विलोपी नामक दैत्य किशोरी पर झपटा। ये देख सूर्य देव ने उसे वहीं भस्म कर दिया। और किशोरी की अराधना से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने किशोरी को आज्ञा दी कि कार्तिक शुक्ल नवमी को आंवले के वृक्ष के नीचे विवाह मंडप बनाकर मुकुंद देव से विवाह कर लो। 

तब भगवान सूर्य के कहे अनुसार मुकुंद देव और किशोरी दोनों ने मिलकर मंडप बनाया। तब एकदम से बादल घिर आए और बिजली चमकने लगी। जैसे ही आकाश से बिजली मंडप की ओर गिरने लगी, आंवले के वृक्ष ने उसे रोक लिया। ऐसा कहा जाता है इसके बाद से ही आंवले के वृक्ष की पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। 

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