Edited By Sarita Thapa,Updated: 12 Jan, 2026 12:54 PM

माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी का त्योहार छात्रों, कलाकारों और संगीत प्रेमियों के लिए विशेष फलदायी होता है। मान्यता है कि इस दिन मां सरस्वती की आराधना करने से जीवन का अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है।
Basant Panchami 2026 : माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी का त्योहार छात्रों, कलाकारों और संगीत प्रेमियों के लिए विशेष फलदायी होता है। मान्यता है कि इस दिन मां सरस्वती की आराधना करने से जीवन का अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है। इस दिन प्रकृति पीले फूलों की चादर ओढ़ लेती है और फिजाओं में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर मां शारदे के अवतरण से इस संसार को वाणी और सुर प्राप्त हुए थे। जब हम किसी देवी-देवता की उपासना करते हैं, तो प्रसाद या भोग केवल भोजन नहीं, बल्कि हमारी श्रद्धा और समर्पण का माध्यम बन जाता है। मां सरस्वती, जो सादगी और सात्विकता की प्रतिमूर्ति हैं, उन्हें अर्पित किया जाने वाला एक विशेष भोग हमारे जीवन की मानसिक और आध्यात्मिक बाधाओं को दूर करने की शक्ति रखता है। तो आइए जानते हैं कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती को कौन का भोग अर्पित करना चाहिए।
मां सरस्वती का सबसे प्रिय भोग: मीठा पीला चावल
शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, मां सरस्वती को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। यही कारण है कि बसंत पंचमी के दिन उन्हें केसरिया मीठे चावल का भोग लगाना सबसे उत्तम माना गया है। पीला रंग शुद्धता, सादगी और ज्ञान के प्रकाश को दर्शाता है। केसर और इलायची से बने चावलों की मिठास जीवन में सौम्यता लाती है। माना जाता है कि जो साधक इस दिन केसरिया चावल का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में बांटता है, उसकी वाणी और बुद्धि की जड़ता खत्म होती है और करियर में आने वाली रुकावटें दूर हो जाती हैं।

इन चीजों का भी लगा सकते हैं भोग
पीली बूंदी के लड्डू: बुद्धि की प्रखरता के लिए।
मालपुआ: पारिवारिक सुख और शांति के लिए।
केसरिया हलवा: ज्ञान और एकाग्रता बढ़ाने के लिए।
बेर और मौसमी फल: बसंत ऋतु के आगमन के स्वागत स्वरूप माँ को बेर जरूर अर्पित करें।
भोग लगाने की सही विधि
सुबह स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें।
मां सरस्वती की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं।
तांबे या पीतल के पात्र में भोग रखें।
भोग लगाते समय 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' मंत्र का जाप करें।
अर्पित करने के बाद यह प्रसाद स्वयं भी ग्रहण करें और दूसरों को भी बांटें।

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